BSNL का बंटाधार, आखिर किसने किया ऐसा बुरा हाल? एक समय, एक दशक में 90 हजार करोड़ से ज्यादा का हुआ था BSNL को नुकसान।
बता दें कि BSNL उस दौर में आई थी, जब लोगों के पास नहीं! बल्कि गांव और मोहल्लों में एक फोन हुआ करता था और एक मिनट की कॉल घड़ी देखकर की जाती थी। आखिर क्यों? लोगों को लैंडलाइन और टेलीफोन बूथ के झंझट से मुक्ति दिलाने वाली ये कंपनी अब खुद राहत पैकेज पर जिंदा है। एक दशक से भी ज्यादा वक्त से कंपनी लगातार घाटे में चल रही और हर दिन पिछड़ रही है।
अब सवाल है कि BSNL की इस हालत के लिए जिम्मेदार कौन है?
बता दें कि, आज भी जहां किसी टेलीकॉम ऑपरेटर का नेटवर्क नहीं होता, वहां BSNL का सिग्नल मिल जाता है। क्योंकि BSNL की कवरेज दूसरी टेलीकॉम कंपनियों के मुकाबले काफी ज्यादा है। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि आज 5G स्पेक्ट्रम की नीलामी में BSNL शामिल तक नहीं है? क्यों BSNL की स्थिति ऐसी हो चुकी है? ऐसे में आईये डालते हैं एक नजर BSNL के इतिहास से वर्तमान स्थिति पर। क्योंकि वर्तमान में अन्य टेलीकॉम कंपनियों ने रिचार्ज की कीमतें बढ़ाई तो लोगों को BSNL की याद आयी। BSNL यानी भारत संचार निगम लिमिटेड, जो एक सरकारी टेलीकॉम कंपनी है। आज वेंटिलेटर पर पहुंच चुकी, इस कंपनी का ऐसा हाल एक दिन में नहीं हुआ है। ना ही इसके दिन शुरू से ऐसे लदे हुए थे। बता दें कि, 01 अक्टूबर 2000 को शुरू होने वाली BSNL का कभी टेलीकॉम सेक्टर में एकछत्र राज था। लेकिन आज सरकार इस कंपनी को बंद होने से बचाने की तमाम कोशिशें कर रही हैं। आईये जानते हैं, अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही इस कंपनी का ऐसा बुरा हाल कैसे हुआ?
यह जानने के लिए हमें लगभग दो दशक पहले चलना होगा, जब इसकी शुरुआत हुई थी। 01 अक्टूबर 2000 को BSNL यानी भारत संचार निगम लिमिटेड की शुरुआत हुई थी। तमाम लोगों के जेहन में 2000 के दशक की यादें होंगी और उन्हें BSNL का स्वर्णिम काल भी याद होगा। उस समय घरों में आज की तरह, हर सदस्य के पास फोन नहीं हुआ करता था। बल्कि पूरे परिवार या फिर पूरे मोहल्ले में सिर्फ किसी एक के पास मोबाइल फोन होता था। हालांकि, वर्ष 2000 के आते-आते लैंडलाइन की संख्या जरूर बढ़ गई थी। लेकिन फिर भी मोबाइल फोन्स विरले ही नजर आते थे। उस दौर में BSNL की सिम हासिल करने के लिए कई दिनों तक लाइन में खड़ा होना होता था। किसी तरह से बीएसएनएल की सिम और एक रुपये प्रति मिनट की दर से कॉलिंग के लिए टैरिफ भी मिलता था। बाद में धीरे-धीरे, इस सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों की एंट्री होने लगी और BSNL के अच्छे दिन लदने लगे। कभी प्रॉफिट पर प्रॉफिट बनाने वाली कंपनी धीरे-धीरे घाटे के धंसती चली गई। और फिर आया BSNL में घाटे का दौर।
वित्त वर्ष 2009-10 वह साल, जब BSNL के घाटे में जाने की शुरुआत हुई। यह पहला साल था जब BSNL को घाटा हुआ था और बाजार में रिलायंस, एयरटेल जैसे प्राइवेट टेलीकॉम प्लेयर्स की एंट्री हो चुकी थी। इस समय जमाना भी बदल गया था और फोन्स की जगह स्मार्टफोन्स ने लेनी शुरू कर दी थी। वहीं टेलीकॉम कंपनियों की पहुंच मोहल्लों से घर और घर से सदस्यों तक होने लगी थी। इस दौर में फोन पर इंटरनेट और कॉलिंग के लिए रेट कटर्स का चलन था। मार्केट में एक दो नहीं, बल्कि कई प्राइवेट प्लेयर्स एक से बढ़कर एक प्लान्स और FRC के साथ आते थे। मल्टी ऑप्शन के इस दौर में कंज्यूमर्स के लिए कई बार रिचार्ज से ज्यादा सस्ता, नया सिम लेना लगता था। ऐसे में BSNL लगातार प्रतिद्वंदियों से पिछड़ने लगी और वित्त वर्ष 2009-10 से शुरू हुआ BSNL के घाटे का दौर अब तक नहीं रुका और अब हालत कंपनी को बचाने पर आ पड़ी थी। क्योंकि कंपनी ने इसके बाद अब तक प्रॉफिट का मुंह नहीं देखा। वित्त वर्ष 2019-20 में कंपनी का घाटा 15,500 करोड़ पहुंच गया था। जिसके बाद तो ऐसा लगने लगा कि, कंपनी का बंद होना तय है।
हालांकि, सरकार ने इसे एक बार फिर प्रॉफिटेबल बनाने की कोशिश करना शुरू कर दी है। इसी कारण वर्ष 2021 में कंपनी को 40 हजार करोड़ रुपये का राहत पैकेज मिला था। इसमें से आधी राशि शॉर्ट टर्म कर्ज को भरने में चली गई और वर्ष 2022 में सरकार ने एक बार फिर BSNL को राहत पैकेज दिया। राहत पैकेज तो ठीक है, लेकिन क्यों आई ऐसी नौबत? इसका असली कारण जानते हैं। बता दें कि, सार्वजनिक क्षेत्रों की टेलीकॉम कंपनी की ऐसी हालत कई वजहों से हुई है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका सरकार और कर्मचारियों के लालफीताशाही और धीरे-धीरे लिए गए फैसलों की है। क्योंकि वर्ष 2021 से पहले, कंपनी का ज्यादातर खर्च कर्मचारियों पर होता था। लगभग 55 से 60 परसेंट कंपनी का पूंजी इसमें ही जाता था। वर्ष 2016 में जियो के आने के बाद टेलीकॉम इंडस्ट्री में बहुत बड़ा बदलाव हुआ। 4G नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ। ऐसे में लोगों का फोकस इंटरनेट पर पहुंच गया। एक तरफ, जहां टेलीकॉम इंडस्ट्री में पहले रेट कटर और लो-कॉलिंग चार्ज वाले प्लान्स का बोलबाला