शायद ही किसी ने मशहूर टेलीविजन धारावाहिक “बालिका बधू” नहीं देखी होगी। जिसप्रकार से बाल बिवाह की कुरीतियों को चित्रित कर, लोगों को जागरूक करने की कोशिश की गई। वह काबिलेतारीफ थी लेकिन आज भी समाज मे बाल विवाह जैसी कुरीतियां मौजूद हैं।
खबरों के खिलाड़ी। हाल ही में आई, एक रिपोर्ट में चिंता व्यक्त की गई है कि भारत में आजादी के आठवें दशक में भी प्रति मिनट तीन नाबालिग लड़कियों की शादी हो रही है। ‘चाइल्ड मैरिज फ्री इंडिया’ के एक अध्ययन के अनुसार, यह संख्या प्रति वर्ष 16 लाख तक पहुंच जाती है। देश में हर साल होने वाली नाबालिग लड़कियों की शादी पर हाल ही में आई ये रिपोर्ट, न केवल हैरान करती है बल्कि इस मुद्दे को गंभीरता से लेने और इस पर नए सिरे से काम करने की जरूरत को भी रेखांकित करती है। अगर आजादी के आठवें दशक यानी अमृत काल में भी, देश में हर मिनट तीन नाबालिग लड़कियों की शादी हो रही है, तो यह स्थिति स्वीकार करने लायक नहीं हो सकती, बल्कि विचारणीय है।
ये आंकड़े चुभने स्वाभाविक हैं। इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि, हमने जाने-अनजाने इस सचाई पर परदा पड़े रहने का इंतजाम कर दिया था। चाहे नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो अर्थात NCRB की रिपोर्ट हो या समय-समय पर सरकार की ओर से जारी किए जाने वाले अन्य आंकड़े, कोई भी ठीक-ठीक यह नहीं बताता कि हर साल कितनी नाबालिग लड़कियों को गैरकानूनी ढंग से शादी के बंधन में डाल दिया जाता है। ऐसा भी नहीं कि ये आंकड़े इस मामले में पूरी तरह चुप्पी बनाए रखते हैं। मिसाल के तौर पर NCRB की बात करें तो, यह 2018 से 2022 के बीच 3,863 नाबालिग शादी दर्ज होने की सूचना देता है। यह संख्या हकीकत से कितनी दूर है, इसका अहसास तब हुआ जब सिविल सोसाइटी संगठनों के नेटवर्क ‘चाइल्ड मैरिज फ्री इंडिया’ से जुड़ी रिसर्च टीम ‘इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन’ ने 2011 की जनगणना से जुड़े आंकड़ों के साथ NCRB और वर्ष 2019-21 के नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 की सूचनाओं को मिलाकर उनका विश्लेषण किया।
इस रिपोर्ट के मुताबिक हर साल 16 लाख नाबालिग लड़कियों की शादी हो रही है। यह स्थिति तब है, जब भारत में वर्ष 1929 में ही नाबालिग शादी को प्रतिबंधित किया जा चुका है। जाहिर है, कानून अपनी जगह रहा और समाज अपने ढंग से चलता रहा। हालांकि इस आधार पर कानूनी व्यवस्थाओं को निरर्थक नहीं करार दिया जा सकता। इसका उदाहरण असम है, जहां इसी रिपोर्ट के मुताबिक हालात में आश्चर्यजनक सुधार लाए जा चुके हैं। वहां 2021-22 में हुई नाबालिग लड़कियों की शादी की संख्या 3,225 थी, जो 2023-24 में घटकर 627 हो गई। यह कामयाबी कानून को सख्ती से लागू करने का ही परिणाम है। अब असम की कामयाबी का मतलब यह भी नहीं कि, हर मामले में समाज को कानून के डंडे से हांका जा सकता है या हांका जाना चाहिए। फिर भी याद रखना जरूरी है कि नाबालिग लड़कियों की शादी पर प्रभावी रोक, न केवल मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी ला सकती है। बल्कि लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और जेंडर इक्वलिटी हासिल करने में भी मदद कर सकती है।
जाहिर है, सरकारी तंत्र और सिविल सोसाइटी को साथ मिलकर इस लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाने में देर नहीं करनी चाहिए। अब आपको क्या लगता है बाल विवाह जैसी कुरीति को खत्म करने के लिए, और क्या किया जा सकता है? अपने जवाब कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिये।