खबरों के खिलाड़ी। दिल्ली में 28 जुलाई को जब बीजेपी की मुख्यमंत्री परिषद की बैठक हुई तो एक वीडियो काफ़ी वायरल हुआ। इस वीडियो में साफ दिखता है कि, ग्रुप फोटो के लिए गृह मंत्री अमित शाह और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह साथ आते हैं। लेकिन चौकाने वाली बात तो ये रही! कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अभिवादन करते हुए तब दिखे, जब सामने राजनाथ सिंह थे। इतना ही नहीं! इसी वीडियो में, इसके बाद जब पीएम नरेंद्र मोदी ग्रुप फोटो के लिए आते हैं तो सभी मुख्यमंत्री हाथ जोड़कर नमस्कार करते दिखे, मगर शेयर किए जा रहे वीडियो में योगी आदित्यनाथ, पीएम मोदी का अभिवादन नहीं करते हैं। ऐसे में, इस वीडियो को शेयर कर लोगों ने बीजेपी के अंदर, सब कुछ ठीक-ठाक ना होने की ओर इशारा किया। वहीं कुछ लोगों का ये कहना था कि, योगी आदित्यनाथ ने नमस्कार किया था, मगर वो वीडियो में दर्ज नहीं हुआ।
हालांकि मुख्यमंत्री परिषद की इस बैठक में मौजूद रहे, यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी वही वीडियो शेयर किया है, जिसे लेकर योगी और भाजपा आलाकमान के बीच दूरियां आने की बात कही जा रही हैं।
योगी आदित्यनाथ, मोदी और शाह की मज़बूती हैं या मजबूरी?
इसे समझने के लिए कुछ वर्ष पीछे चलते हैं। याद कीजिये, साल 2021 ख़त्म और यूपी विधानसभा चुनाव प्रचार शुरू होने को था। उस समय भी अटकलें थीं कि, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अनबन है। लेकिन तभी, 21 नवंबर 2021 को दो तस्वीरें सामने आईं। जिसमे एक तस्वीर में मोदी, योगी से कुछ कहते दिखे। तो दूसरे तस्वीर में कैमरे की तरफ़ पीठ किए हुए मोदी, योगी के कंधे पर हाथ रखे हुए दिखे।
तब योगी आदित्यनाथ के सोशल मीडिया अकाउंट्स से इन तस्वीरों को साझा करते हुए लिखा गया था- ‘‘हम निकल पड़े हैं प्रण करके, अपना तन-मन अर्पण करके, जिद है एक सूर्य उगाना है, अंबर से भी ऊंचा जाना है। अब, अगले ढाई साल में योगी दोबारा यूपी के सीएम बन गए और मोदी तीसरी बार पीएम। मगर जिस ‘अंबर से ऊंचे जाने’ और ‘सूर्य उगाने’ की बात मोदी और योगी की तस्वीरों के साथ लिखी गई थी, वो बस कवि की कल्पना मात्र ही रह गई। क्योंकि योगी और मोदी के बीच अनबन की खबरें आज भी जीवंत हैं। प्रमाण के तौर पर देखा जाए तो, वर्ष 2017 यूपी विधानसभा चुनाव में 312 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2022 में 255 सीटें ही जीत पाई। वर्ष 2019 लोकसभा चुनाव में यूपी की 62 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2024 में 33 सीटों पर सिमट गई। साथ ही भाजपा के इसी सियासी ढलान के साए में, योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य के ताज़ा बयानों ने, और ज्यादा फिसलन बढ़ाई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि 2024 चुनाव के बाद, क्या मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी के सामने योगी आदित्यनाथ मज़बूती बन गए हैं या मजबूरी?
क्या योगी आदित्यनाथ के सामने चुनौतियां हैं या वो ख़ुद किसी अन्य के लिए चुनौती बन गए हैं?
बता दें कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह के बाद संभवत: योगी आदित्यनाथ ही हैं, जिन्होंने बीते चुनावों में कई राज्यों में जाकर प्रचार किया। भाजपा के स्टार प्रचारकों की लिस्ट के शुरुआती नामों में योगी आदित्यनाथ का नाम आता है। मगर ये भी सत्य है! बीजेपी में योगी की बनी इस मजबूत जगह की शुरुआत ही एक बगावत से हुई थी। इसे समझने के लिए कुछ साल पीछे चलते हैं। अर्थात काला चश्मा, टाइट कपड़े वाले अजय सिंह बिष्ट यानी योगी आदित्यनाथ के कॉलेज वाले दिनों में। बता दें कि, शरत प्रधान और अतुल चंद्रा अपनी किताब ‘योगी आदित्यनाथ’ में लिखते हैं– अजय सिंह बिष्ट के एक जीजा चाहते थे कि, वो एक वामपंथी पार्टी की स्टूडेंट विंग से जुड़ें मगर अजय एबीवीपी से जुड़े। ख़ूब मेहनत की मगर जब एबीवीपी ने अजय को उम्मीदवार नहीं बनाया तो वहीं से विरोध की पहली चिंगारी दिखाई दी। तब अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ योगी, एबीवीपी के ख़िलाफ़ ही निर्दलीय चुनाव लड़ गए, मगर जीत ना सके। ये योगी आदित्यनाथ की चुनावी राजनीति की पहली और इकलौती हार है। क्योंकि 26 साल की उम्र में पहली बार सांसद बनने से लेकर, दूसरी बार यूपी का सीएम बनने तक योगी आदित्यनाथ ख़ुद, कभी चुनाव नहीं हारे हैं। अगर कभी पार्टी के भीतर ही योगी की बात ना सुनी जाए तो इसका असर चुनावी नतीजों में भी देखने को मिला।

जानकारों के मुताबिक़- योगी का बीजेपी में रहते हुए ही पार्टी नेताओं से टकराव रहा है। वो अपने लोगों की सूची नेतृत्व के सामने रखकर टिकट मांगा करते और कई बार योगी ने बीजेपी के ख़िलाफ़ ही बाग़ी उम्मीदवारों को खड़ा किया और प्रचार भी किया। मगर बीतते वक़्त के साथ योगी का रुख़ नरम हुआ। अब योगी बनाम बीजेपी के बड़े नेताओं का यही ‘टकराव’ लोकसभा 2024 चुनावी नतीजों के बाद एक बार फिर दबी ज़बान सामने आ रहा है। इस टकराव की बात दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने मई 2024 में कही थी। एक चुनावी सभा में केजरीवाल ने दावा किया था, ”अगर ये चुनाव जीत गए तो मेरे से लिखवा लो- दो महीने के अंदर उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बदल देंगे ये लोग। योगी आदित्यनाथ की राजनीति ख़त्म करेंगे, उनको भी निपटा देंगे। हालांकि जानकारों की माने तो, यूपी उपचुनाव तक ऐसा होने की कोई उम्मीद नहीं है और बीजेपी इतना बड़ा ख़तरा नहीं उठाएगी।
योगी को हटाना बीजेपी के लिए आसान क्यों नहीं है?
बीते कुछ सालों में बीजेपी शासित राज्यों और कुछ नामों को याद कीजिए। मध्य प्रदेश: शिवराज सिंह चौहान, हरियाणा: मनोहर लाल खट्टर, उत्तराखंड: त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत, गुजरात: विजय रुपाणी और त्रिपुरा: बिप्लब देब। चुनाव से पहले या चुनाव के बाद बीजेपी ने अपने इन बड़े चेहरों को सीएम कुर्सी से दूर किया है। दूसरे दलों की तरह बीजेपी आलाकमान कभी इस ख़ौफ़ में नहीं दिखी कि पार्टी टूट सकती है। इसी कारण बीजेपी उन नेताओं को भी सीएम बना सकी, जिनके नाम का किसी को अंदाज़ा भी नहीं था। मगर यूपी के मामले में ऐसा नहीं होता है, योगी आदित्यनाथ बीजेपी आलाकमान की मजबूरी हैं। आईये बताते हैं इसकी वजह, क्यों नहीं हटाये जाएंगे योगी? देखा जाए तो ”योगी आदित्यनाथ बीजेपी की मजबूरी भी हैं और मज़बूती भी। आप योगी को हटाएंगे तो वो चुप नहीं बैठेंगे और इससे बीजेपी का ही नुकसान होगा। मज़बूती इसलिए हैं कि दूसरे राज्यों में भी, अगर मोदी के बाद सबसे ज़्यादा डिमांड किसी की आती है तो वो योगी हैं। योगी ने फायर ब्रांड हिंदू नेता की छवि को बहुत अच्छे से बनाया है। इसके अलावा ”दूसरी वजह है नाथ संप्रदाय, जो पूरे देश में फैला है और योगी उसके महंत हैं और भाजपा इस उपयोगिता को बखूबी समझती है।
प्यारे पाठकों यूपी भाजपा में मचे घमासान को लेकर आप क्या सोचते हैं? अपने जवाब कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिये।