क्या मोदी से नाराज हैं उनके हनुमान? क्योंकि आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और लैटरल एंट्री जैसे मुद्दों पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के प्रतिदिन नए बयान आ रहे हैं।
अब सवाल है-
- आखिर अपने बयान के द्वारा कौन से राजनीतिक लक्ष्य को साधाना चाहते हैं चिराग?
- क्या है चिराग के भविष्य की राजनीति?
- क्या पिता रामविलास पासवान से बड़े “राजनैतिक मौसम वैज्ञानिक” हैं चिराग?
- क्या मोदी के हनुमान से भाजपा को है खतरा?
तो आईये बताते हैं आपको, इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से।

खबरों के खिलाड़ी। फिलहाल चिराग पासवान अपने बयानों को लेकर इन दिनों चर्चा में हैं। चिराग, नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल का सदस्य हैं और वे खुद को नरेंद्र मोदी का हनुमान बताते हुए थकते नहीं हैं। लेकिन मौका पड़ने पर, वह सरकार की आलोचना से भी पीछे नहीं हटते हैं। पिछले कुछ दिनों से आए उनके बयानों से बीजेपी असहज होगी। क्योंकि चिराग आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ, सार्वजनिक तौर पर बयान दे चुके हैं। इतना ही नहीं, चिराग ने वक्फ बोर्ड पर लाए गए बिल और लैटरल एंट्री पर आए यूपीएससी के विज्ञापन पर भी आपत्ति जताई थी। बता दें कि, चिराग पासवान इन दिनों दलितों के मुद्दों पर काफी मुखर हैं और उनकी राजनीति में आए इस बदलाव के बाद, राजनीतिक पंडितों को चिराग पासवान में भी एक राजनीतिक मौसम वैज्ञानिक नजर आ रहा है। राजनैतिक मौसम वैज्ञानिक का मतलब:- एक ऐसा राजनेता, जो राजनीतिक हवाओं का रुख समय रहते भांप लेता है। इसीलिए चिराग के पिता रामविलास पासवान को भी मौसम वैज्ञानिक ही कहा जाता था। पिता रामविलास पासवान के साये में रहकर ही चिराग पासवान ने भी राजनीति के गुर सीखे हैं।
गौर कीजिए, जब पिता के निधन के बाद चिराग ने पार्टी की कमान अपने हाथ में ले ली थी। तब साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग की पार्टी लोजपा ने, नीतीश कुमार के जेडीयू के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतार दिए। लेकिन बीजेपी के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा किया। उस चुनाव के समय से ही चिराग ने खुद को नरेंद्र मोदी का हनुमान कहना शुरू कर दिया था। चिराग की इस रणनीति का असर भी हुआ और नीतीश कुमार की पार्टी पहली बार, बीजेपी की जूनियर पार्टी बनकर रह गई। हालांकि, इससे चिराग को कोई फायदा नहीं हुआ और लोजपा 5.66 फीसदी वोट के साथ एक सीट ही जीत पाई।
बता दें कि, लोकसभा चुनाव 2024 से पहले तक चिराग की पार्टी, बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा नहीं थी। लेकिन फिर भी चिराग खुद को नरेंद्र मोदी का हनुमान कहते रहते थे। लोकसभा चुनाव से पहले चिराग ने भाजपा से जमकर मोलभाव किया। तब जाकर भाजपा ने लोजपा को पांच सीटें, चुनाव लड़ने के लिए दीं। वहीं, उनके चाचा पसुपति पारस को खाली हाथ रहना पड़ा और जब चुनाव परिणाम आए तो लोजपा ने सभी पांचों सीटें जीत लीं। तब 100 फीसदी स्ट्राइक रेट वाले चिराग पासवान के राजनीतिक कौशल और चुनाव प्रबंधन का लोहा दुनिया ने भी माना और सभी पांच सीटें जीतने का इनाम चिराग पासवान को मिला। जब उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया।
केंद्रीय मंत्री बनने तक तो सब ठीक गति से चलता नजर आ रहा था और चिराग, पीएम मोदी के हनुमान की ही भूमिका में नजर आ रहे थे। लेकिन वक्फ बोर्ड को लेकर लाए गए बिल पर चिराग का रुख बदलता हुआ नजर आया। जिसके बाद चिराग ने मांग किया कि, सरकार इस बिल को संसदीय समिति को भेजे। इसी बीच, एक अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण में सब कैटेगरी बनाने को लेकर एक फैसला सुना दिया। फैसला सुनाते हुए एक जज ने एससी-एसटी आरक्षण में भी क्रीमीलेयर लागू करने की बात कर दी। जिससे एससी-एसटी के एक बड़े वर्ग में इस फैसले को लेकर नाराजगी पनपने लगी। जिसे चिराग ने भांप लिया और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अपनी पार्टी की ओर से एक पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात कर दी।
इस बात ने बीजेपी को असहज कर दिया और इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ 21 अगस्त को बुलाए गए भारत बंद का चिराग की लोजपा ने समर्थन भी किया। अब सवाल है- आखिर क्यों चिराग पासवान, केंद्र सरकार का हिस्सा होते हुए भी उसके फैसलों पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। दरअसल चिराग पासवान में आए इस बदलाव के पीछे है बदलती राजनीतिक हवा। बता दें कि, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने आरक्षण और संविधान को मुद्दा बनाया और उनका कहना था कि, अगर बीजेपी फिर सत्ता में आई तो वह बाबा साहब के बनाए संविधान को बदल देगी तथा आरक्षण खत्म कर देगी। ये मुद्दे, चुनाव में विपक्ष की संजीवनी बने और इसका परिणाम यह हुआ कि, भाजपा अपने दम पर बहुमत लाने में कामयाब नहीं हो पाई। शायद! लोकसभा चुनाव परिणाम से दलितों और वंचितों के मुद्दों की ताकत का एहसास चिराग पासवान को हुआ है। इसलिए वह दलितों के किसी मुद्दे पर चुप नहीं रहते हैं। क्योंकि चिराग का वोट बैंक भी दलित वर्ग ही है।
हालांकि चिराग की इस सक्रियता का एक दूसरा पहलू, अगले साल होने वाला बिहार विधानसभा का चुनाव भी है। वह इन बयानबाजियों के द्वारा भाजपा से एक बार फिर, अधिक से अधिक सीटें लेने की कोशिशें कर रहे हैं। इसके अलावा, रामविलास पासवान के निधन के बाद से बिहार और देश में दलित नेतृत्व में एक खालीपन आया है और चिराग की नजर, इस खाली जगह को भरने पर भी लगी हुई है। क्योंकि मायावती की पार्टी बसपा संसद में शून्य है और उसका जनाधार भी लगातार खिसक रहा है। ऐसे में चिराग को राष्ट्रीय राजनीति में दलित चेहरे के रूप में अपनी जगह भी दिखाई देने लगी है।
हालांकि, चिराग के इन कदमों से भाजपा असहज है। ऐसे में भाजपा, बिहार में चिराग के विकल्प की तलाश कर रही है और चिराग के विकल्प के रूप में बीजेपी अपने प्रवक्ता गुरुप्रकाश पासवान को आगे बढ़ा सकती है। गुरुप्रकाश, अटल बिहार वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे डॉक्टर संजय पासवान के बेटे हैं। ऐसे में गुरुप्रकाश पासवान भी वोटबैंक को साध सकते हैं, जो अभी चिराग पासवान के साथ बना हुआ है। सूत्रों की माने तो बीजेपी, संजय और गुरुप्रकाश में से किसी एक को राज्यसभा भेज सकती है।
अब चिराग के राजनैतिक भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं? अपने जवाब कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिये।