आरक्षण देश का एक ज्वलंत मुद्दा, जिसे वर्षों से राजनैतिक पार्टियां अपने सत्ता की रोटी में मक्खन की तरह उपयोग कर रही हैं। जिसका नुकसान देश की संपत्ति और जनता को उठाना पड़ता है और एकबार फिर से, 2 अप्रैल 2018 के जैसे ही देश को आग में झोंकने की तैयारी थी, जो 21 अगस्त 2024 को असफल रही। क्योंकि अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण में क्रीमी लेयर को लेकर, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों ने 21 अगस्त यानी बुधवार को भारत बंद बुलाया था। ऐसे में आईये जानते हैं, कहाँ और कैसा रहा? दलित तथा आदिवासी संगठनों के भारत बंद का असर। इसके अलावा, भारत बंद को लेकर क्या रही राजनैतिक पार्टियों और नेताओं की प्रतिक्रिया।

खबरों के खिलाड़ी। बता दें कि भारत बंद का असर कई राज्यों में देखने को मिला। वहीं कुछ राज्यों में इसका मिलाजुला असर रहा। बिहार में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने लाठी चार्ज भी किया। क्योंकि भारत बंद के दौरान कई जगहों पर हाइवे जाम किया गया। बता दें कि, भारत बंद का असर बिहार और झारखंड में ज़्यादा दिखा और इनदोनों राज्यों में यातायात समेत कई सेवाएं प्रभावित रहीं। साथ ही, बंद को लेकर राजनीति भी तेज़ है। एकतरफ जहां केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने भारत बंद का विरोध किया और इसे अनैतिक और स्वार्थी करार दिया। वहीं, केंद्रीय मंत्री और एनडीए के सहयोगी दल “लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)” के अध्यक्ष चिराग पासवान ने बंद को नैतिक समर्थन दिया।
एक तरफ भारत बंद को लेकर केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतनराम मांझी ने समाचार एजेंसी एआईएनए से कहा, “जो लोग भारत बंद का आह्वान किए हैं वो स्वार्थी तत्व हैं। स्वार्थी तत्व मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि वो मेरे बड़े भाई हैं। लेकिन वे नहीं चाहते हैं कि छोटे भाई की भलाई हो। हम सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद देते हैं जिन्होंने “कोटे में कोटा” जैसे वर्गीकरण की बात की। मांझी ने आगे कहा, “अनुसूचित जाति को मिलने वाले आरक्षण का 90 प्रतिशत लाभ कुछ जातियों ने ही लिया है। वहीं दूसरी तरफ, लोजपा(आर) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने बंद को नैतिक समर्थन दिया। उन्होंने एक ट्वीट के ज़रिए इसकी जानकारी दी। चिराग ने कहा कि, रामविलास पासवान के सिद्धांतों पर चलने वाली लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) दलितों के हक और अधिकार के लिए लड़ाई लड़ते रहेगी। लोजपा(आर) के कार्यकर्ताओं ने राज्य के कई हिस्सों में बंद के प्रदर्शनों में हिस्सा भी लिया।
वहीं, महाराष्ट्र के कांग्रेस विधायक और कांग्रेस के एससी विभाग के पूर्व अध्यक्ष नितिन राउत ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, “देश के संविधान में बदलाव की भाषा बोली जा रही है। इसमें केंद्र सरकार, भाजपा और आरएसएस ने एससी-एसटी समुदाय के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ की भूमिका निभाई है। “यह आरएसएस का छिपा हुआ एजेंडा था और यह सरकार उस एजेंडे को सामने लाने का प्रयास कर रही है। अतः इसलिए यह भारत बंद बुलाया गया है।
बता दें कि, इससे पहले भी 02 अप्रैल 2018 को दलित संगठनों की ओर से बुलाए गए भारत बंद में कई जगह हिंसा हुई थी और मध्य प्रदेश में छह लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन इसबार भारत बंद का ज्यादातर असर विभिन्न शहरों के मुख्य इलाकों, खासतौर पर बाज़ार, नेशनल और स्टेट हाईवे पर दिखा। बिहार की राजधानी पटना के डाक बंगला चौराहे पर पुलिस ने प्रदर्शनतकारियों पर लाठियां भी चलाईं, जिसमें कई प्रदर्शनकारी चोटिल हो गए। इस बंद का असर, बिहार के पूर्णिया, सहरसा, बक्सर, जहानाबाद, नवादा, औरंगाबाद सहित कई जिले में देखने को मिला। क्योंकि, यहां जगह-जगह रेल यातायात और सड़क यातायात को जाम करके प्रदर्शनकारियों में प्रदर्शन किया।
इसके अलावा, भीम आर्मी के मुखिया चन्द्रशेखर आज़ाद ने एक्स पर लिखा, “सरकार हमारे शांतिपूर्वक संवैधानिक आंदोलन को रोक नहीं पा रही है तो अब हमारे बहुजन समाज को लाठी से पीटकर आंदोलन को कुचलने का प्रयास कर रही है। बता दें कि, राजस्थान में भी सुबह से ही भारत बंद का असर देखने को मिला। क्योंकि सड़कों पर अमूमन दिनों में नज़र आने वाली चहल-पहल नहीं दिखी। राजस्थान के जयपुर, बाड़मेर, जालोर, जोधपुर समेत सभी ज़िला मुख्यालयों पर एसटी-एससी संगठनों ने रैलियां निकाल कर आरक्षण में वर्गीकरण का विरोध किया। राजस्थान प्रशासन ने एहतियातन, सोलह ज़िलों में शिक्षण संस्थान बंद किए और करौली, भरतपुर, सवाई माधोपुर और डीग-कुम्हेर ज़िले में इंटरनेट भी बंद रखा गया। राजस्थान में भारत बंद को भारत आदिवासी पार्टी, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और कांग्रेस के कई सांसद और विधायकों ने समर्थन किया। एकतरफ, एससी-एसटी संगठन बंद को सफल बता रहे हैं, जबकि भाजपा नेता किरोड़ी लाल मीणा ने बंद को बेतुका बताया।
बता दें कि, बीते कुछ दिनों से आरक्षण का मुद्दा गरमाया हुआ है। जबसे, एक अगस्त को एससी/एसटी आरक्षण में वर्गीकरण करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आया था। तबसे, इस फ़ैसले पर दलित संगठनों और विपक्षी राजनीतिक दलों ने अपनी आशंका ज़ाहिर की थी। इसके अलावा, पिछले हफ़्ते ही यूपीएससी की ओर से 45 पदों पर लेटरल एंट्री यानी सीधी भर्ती के विज्ञापन ने विवाद खड़ा कर दिया था। हालांकि सरकार ने इसे वापस करने का फैसला कर लिया है। लेकिन फिर भी दलित संगठन आरक्षण को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। जबकि सरकार का कहना है कि वो संविधान की भावनाओं के अनुरूप काम कर रही है।
बता दें कि, छह साल पहले भी 02 अप्रैल 2018 को दलित संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया था। तब यह बंद भी सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के विरोध में आयोजित किया गया था, जिसमें सर्वोच्च अदालत ने एससी/एसटी एक्ट के मामलों में तुरंत गिरफ़्तारी न करने का फ़ैसला दिया था। उस समय भी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को लेकर, देशभर के एससी और एसटी संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया आई थी और संसद में इस समुदाय से जुड़े सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का विरोध किया था। हालांकि, उसी साल संसद के मॉनसून सत्र में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को अध्यादेश लाकर बदल दिया और यह क़ानून पहले की तरह ही हो गया।
लेकिन सवाल यह है कि, आखिर कब तक अफवाहों के विसात पर, भोली-भाली जनता को सड़कों पर उतारकर सत्ता की मलाई खाएंगे नेता?