खबरों के खिलाड़ी । देवउठनी एकादशी के अवसर पर काशी के घाटों पर आस्था की लहरें और भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा।

विश्व की धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी काशी में देवउठनी एकादशी के अवसर पर भोर से ही श्रद्धालुओं का रेला उमड़ने लगा। वाराणसी के अस्सी घाट से लेकर तुलसी घाट, केदारघाट, विश्व प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट एवं डॉ राजेंद्र प्रसाद घाट समेत अन्य घाटों पर श्रद्धालु गंगा स्नान कर आचमन और पंडों-पुरोहितों को दान कर रहे। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए जल पुलिस, एनडीआरएफ अलर्ट है। वहीं पुलिस भी मुस्तैद है। स्नानार्थियों को गहरे पानी में न जाने के लिए आगाह किया जा रहा है।
मंगलवार की भोर में जब सूरज की किरणें गंगा की लहरों पर बिखरीं तो घाटों पर श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान कर आशीर्वाद लिया। “हर-हर महादेव” और “जय मां गंगे” के जयकारों से काशी की हवा भी भक्तिमय हो गई।
गंगा स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने ब्राह्मणों, भिक्षुकों को दान देकर पुण्य कमाया। विशेष पूजा और शंखध्वनि के साथ भगवान श्री विष्णु को जागृत किया गया।
आइए जानते है देवउठनी एकादशी के बारे में ।
कहा जाता है कि इस एकादशी व्रत का माहात्म्य बतलाते हुए श्रीमहादेव जी भी कार्तिकेय से कहते हैं कि हे व्रत धारियों में श्रेष्ठ कार्तिकेय ! जो पुरुष कार्तिक मास की इस तिथि से अंतिम पांच दिनों [पाँच रात्र] में ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मंत्र के द्वारा श्रीहरि का पूजन-अर्चन करता है वह समस्त नरक के दुःखों से छुटकारा पाकर अनामयपद को प्राप्त होता है।
इस व्रत को भीष्म जी ने भगवान वासुदेव से प्राप्त किया था इसलिए यह व्रत ‘भीष्मपंचक’ नाम से भी प्रसिद्द है। देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है। आइए जानते हैं तिथि, शुभ मुहुर्त और पूजा विधि।
इस दिन भगवान विष्णु के जागने के साथ ही, हिंदू धर्म में मांगलिक कार्यों की शुरुआत मानी जाती है। काशी के मंदिरों में पूजा का विशेष आयोजन हुआ, जहां शालिग्राम और तुलसी की पूजा की गई।
गंगा तट पर श्रद्धा और आस्था का ऐसा दृश्य था कि मानो समूचा काशी एक सजीव मंदिर बन गया हो।