खबरों के खिलाड़ी । आज पूरे देश में देव दिवाली धूमधाम से मनाई जा रही है । देव दीपावली के त्योहार की बात करे तो हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। हर साल देव दीपावली के दिन लोग गंगा नदी के घाट पर दीपक जलाते हैं और अपने घरों में भी पूजा आराधना करते हैं। माना जाता है कि, इस दिन भगवान शिव पृथ्वी पर आते हैं देवता दीपक जलाकर उनका स्वागत करते हैं। आज हम आपके इसी संशय को अपने इस लेख में दूर करेंगे।

इसलिए मनाई जाती है देव दीपावल ।
देव दिवाली का धार्मिक महत्व यह है कि, इस दिन देवों के देव महादेव की पूजा आराधना की जाती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था और देवताओं को त्रिपुरासुर के भय से मुक्ति दिलाई थी। इसीलिए देव दीपावली के दिन को ‘त्रिपुरारी पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। इस अवसर पर दीप जलाकर और गंगा स्नान कर पुण्य अर्जित करने का महत्व माना जाता है। माना जाता है कि, इस दिन भगवान शिव पृथ्वी पर आते हैं और देवता गंगा के तट पर, खासकर वाराणसी में दीपक जलाकर धूमधाम से भगवान शिव का स्वागत करते हैं। इस दिन गंगा के घाटों पर आरती का बड़ा महत्व है।
एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवतागण देवउठनी एकादशी के दिन जागृत होते हैं और कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा और यमुना के तटों पर स्नान करके दीपावली मनाते हैं। इसलिए भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन को देव दीपावली के नाम से जाना जाता है।
काशी में देव दिवाली ।
काशी में गंगा नदी का विशेष धार्मिक महत्त्व है। यहाँ पर स्थित अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट जैसे अनेक घाट इस पर्व के मुख्य आकर्षण होते हैं। इस बार इस कड़ी में नमो घाट भी जुड़ने जा रहा है, जिसका उद्घाटन उपराष्ट्रपति करने वाले हैं। कार्तिक पूर्णिमा की शाम लाखों दीपक से गंगा घाट जगमग होंगे। मान्यता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से पापों का नाश होता है और मनुष्य का पुनर्जन्म से मुक्त होने का मार्ग खुलता है।

देव दीपावली कब मनाई जाएगी?
देव दिवाली का त्योहार कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, इस साल कार्तिक पूर्णिमा तिथि की शुरुआत सुबह 6 बजकर 19 मिनट से होगी। इस तिथि का समापन देर रात 2 बजकर 58 मिनट पर होगा। यानि स्वाभाविक है कि 16 नवंबर की सुबह तक यह तिथि व्याप्त नहीं रहेगी।
देव दीपावली पर दीप जलाने की यह परंपरा 1985 में शुरू हुई थी, जब पहली बार कार्तिक पूर्णिमा पर पंचगंगा घाट और उसके आस-पास के पांच घाटों को दीपों से सजाया गया। मंगलागौरी मंदिर के महंत नारायण गुरु और कुछ अन्य लोगों ने इस दीपोत्सव की शुरुआत की थी।