खबरों के खिलाड़ी । सेक्युलर थे, सेक्युलर हैं और सेकुलर बने रहेंगे! ये शब्द देश की सर्वोच्च अदालत के हैं। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी बहस को विराम दे दिया है। आपको बता दें कि- भारतीय संविधान की प्रस्तावना में शामिल ‘सेकुलर’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को लेकर, चल रही लंबी बहस पर सुप्रीम कोर्ट ने विराम लगा दिया है।
अदालत ने इन शब्दों को संविधान में जोड़ने के संशोधन को वैध करार देते हुए कहा कि- इन दोनों शब्दों को हटाने की कोई गुंजाइश ही नहीं है। दरअसल, संविधान की प्रस्तावना के दो शब्दों – धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी को लेकर, करीब आधी सदी से जारी बहस पर सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से पूर्णविराम लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इससे जुड़ी याचिका को खारिज करते हुए, दो बातें बिल्कुल साफ कर दी है। एक बात तो यह कि- संविधान की प्रस्तावना में इन दो शब्दों को जोड़ना गलत नहीं था और दूसरी बात यह कि- एक और संविधान संशोधन के जरिए, इन शब्दों को प्रस्तावना से हटाने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। बता दें कि- इस क्रम में अदालत ने बहस के कई अहम पहलुओं पर रोशनी डाली। इस बहस से फैसले की सार्थकता और बहस की निर्थकता दोनों स्पष्ट होती है। जैसा कि इस मामले में अदालत में दायर याचिका से भी स्पष्ट है की- संविधान की प्रस्तावना में इन दो शब्दों को जोड़े जाने हेतु किए गए संशोधन को, दो मुख्य आधारों पर गलत बताने की कोशिश की जाती रही थी।
एक बात तो यह कि- वर्ष 1976 में यह संशोधन तब किया गया, जब लोकसभा का नियमित कार्यकाल समाप्त हो चुका था। दूसरी बात यह कि- संविधान निर्माता! इन दो शब्दों को जोड़े जाने के प्रस्ताव पर विचार करने के बाद, उसे नामंजूर कर चुके थे। अब सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों आधारों को खारिज कर दिया है। अर्थात इस फैसले ने इस तथ्य की ओर फिर से ध्यान खींचा कि- प्रस्तावना में सेकुलर शब्द जोड़े जाने से पहले भी, संविधान का ढांचा सेकुलर ही था। समय-समय पर अलग-अलग मामलों में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से भी, इस बात की पुष्टि होती रही है। जहां तक, ये सेकुलर और समाजवादी शब्द जोड़े जाने का सवाल है! तो सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, देश की संसद को इस तरह के संशोधन करने का पूरा अधिकार है। लेकिन, चूंकि ये शब्द संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं। इसलिए इन्हें प्रस्तावना से हटाने की कोई भी कोशिश, असंवैधानिक मानी जाएगी। बता दें कि- सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने रेखांकित किया है कि, चाहे सेकुलर हो या समाजवादी! ये दोनों शब्द हमारे संविधान की प्रगतिशीलता को बनाए रखने में सहायक हैं। जहां धर्मनिरपेक्षता! नागरिकों की समानता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मूल अधिकारों को सुनिश्चित करती है। वहीं समाजवाद के प्रति निष्ठा, राज्य के कल्याणकारी स्वरूप को बनाए रखने में मदद करती है। ये दोनों शब्द! नीति निर्देशक तत्वों में दिए गए समान आचार संहिता जैसे लक्ष्यों की ओर बढ़ने में भी, किसी तरह की बाधा खड़ी नहीं करते।
अतः कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि- सेकुलर और समाजवाद जैसे शब्दों और मूल्यों से पीछा छुड़ाने की, हाल के वर्षों में तेज हुई प्रवृत्ति को स्वस्थ और प्रगतिशील नहीं माना जा सकता। ऐसे में बेहतर होगा की- ऐसी मानसिक प्रवृत्तियों को बढ़ावा न दिया जाए। अब सुप्रीमकोर्ट के इस सुप्रीम फैसले पर, आपकी क्या प्रतिक्रिया है? जवाब जरूर दें।