संभल हिंसा ने देश में एकबार फिर, धार्मिक सहिष्णुता पर लगाया प्रश्नचिन्ह

Spread the love & Share it

खबरों के खिलाड़ी। अगर एडिट दिशानिर्देश जारी किए जाएं, तो शायद संभल हिंसा जैसे मामले रुक सकते हैं। क्योंकि संभल में हुई हिंसा ने देश में एकबार फिर, धार्मिक सहिष्णुता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। ऐसा इसलिए! क्योंकि Places of Worship Act, 1991 के बावजूद भी, देश में धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। संभल का मामला तो इस बात का एक उदाहरण है कि- कैसे न्यायपालिका का एक फैसला भी सांप्रदायिक तनाव को बढ़ा सकता है। आपको बता दें कि- संभल में जो कुछ घट रहा है। वह देश पहली बार नहीं देख रहा और इससे फिर जाहिर हो गया है कि- Places of Worship Act, 1991 जैसा कानून होने के बाद भी, एक ही गलती बार-बार दोहराई जा रही है। क्योंकि संभल में किसकी गोली से चार लोगों की जान गई! यह जांच का विषय हो सकता है।

लेकिन यह स्पष्ट है कि- न्यायपालिका की एक चूक ने, संभल को इस स्थिति में पहुंचा दिया है और यह विवाद भी उसी तरह आकार ले रहा है, जैसे काशी और मथुरा में। चुकी संभल की जामा मस्जिद का मामला संवेदनशील है, ऐसे में पहला सवाल तो यही उठता है कि- जिला अदालत ने इतने आनन-फानन में फैसला क्यों दिया? जबकि महज एक याचिका आती है, जिसमें दावा किया जाता है कि- इस जगह मंदिर हुआ करता था, जिसे सन 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने ध्वस्त कर, मस्जिद का निर्माण कराया। अब याचिका पर उसी दिन सुनवाई होती है और सर्वे का आदेश आ जाता है। आखिर, सर्वे का आदेश देने की इतनी जल्दी क्या थी?

ऐसे में सवाल उठना लाजमी है- आखिर किस काम का है कानून? आपको बता दें कि- Places of Worship Act, 1991 को राम जन्मभूमि विवाद की परछाई में लाया गया था। यह एक्ट कहता है कि- 15 अगस्त 1947 को जो पूजास्थल जिस धार्मिक स्वरूप में था, वह वैसा ही रहेगा और उसे बदला नहीं जा सकेगा। यहां तक कि! एक ही धर्म के भीतर दूसरे संप्रदाय द्वारा भी, उस स्थल का बदलाव नहीं होगा। हालांकि जब यह एक्ट आया! तब अयोध्या मामला सुप्रीम कोर्ट में था। अर्थात, अयोध्या मामले को एक्ट से अलग रखा गया। लेकिन अब यह हो रहा है कि- आए दिन किसी जगह को लेकर अदालतों में याचिका डाली जा रही है और आश्चर्य है कि, सर्वे के लिए आदेश भी दिया जा रहा है। अब ऐसा लग रहा है कि- विवादों के बांध को खोल दिया गया है। इसकी एक वजह खुद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ द्वारा की गई, Places of Worship Act की अतिरिक्त व्याख्या है। क्योंकि मई 2022 में चंद्रचूड़ ने कहा था कि- किसी पूजास्थल का धार्मिक स्वरूप नहीं बदला जा सकता, लेकिन धार्मिक स्वरूप की जांच करने से कानून नहीं रोकता। चंद्रचूड़ की इस व्याख्या ने विवादों को पैर जमाने की जगह दे दी। अब इसी की आड़ में तमाम जगह सर्वे की मांग उठ रही है। जबकि सुप्रीम कोर्ट में 1991 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाएं आज भी लंबित हैं। आपको बता दें कि- वर्ष 2022 में तत्कालीन CJI- यूयू ललित की अगुआई वाली बेंच ने केंद्र सरकार से इस मसले पर जवाब मांगा था, जो अभी तक नहीं मिला है।

अब सरकार की चुप्पी और निचली अदालतों की अतिरिक्त, तेजी से देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो रहा है। ऐसे में बेहतर होगा कि- सुप्रीमकोर्ट इसमें दखल देकर, निचली अदालतों के लिए दिशा-निर्देश जारी करे। और बताए कि- इस तरह के मामलों को, किस तरह से हैंडल करना है। वरना यह आग! तेजी से फैलती ही जाएगी। 

 

Spread the love & Share it

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *