खबरों के खिलड़ी । भारतीय लोकतंत्र इस बात का सदैव साक्षी रहा है कि- हमेशा से लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग, सूझबूूझ और विवेक के साथ किया है। लेकिन सवाल है कि- ईवीएम और मतपत्र को लेकर जारी विरोधाभास से, क्या लोकतंत्र में कायम रहेगा भरोसा? बता दें कि- मतपत्रों के इस्तेमाल की मांग को, जिन तर्कों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया है, वे गौर करने लायक हैं। क्योंकि देश मे ईवीएम को खारिज कर, पुरानी प्रणाली की ओर लौटने की मांग उठी है और महाराष्ट्र चुनाव में कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए सवाल उठाए गए हैं। लेकिन झारखंड के नतीजों का तर्क सामने आते ही! ऐसे सवाल बेमानी हो गए। दरअसल, अब तक ऐसा ठोस प्रमाण सामने नहीं लाया जा सका है, जिससे कहा जा सके कि- वर्तमान प्रणाली किसी अपूरणीय कमी से ग्रसित है और बड़े बदलाव की जरूरत है।
हालांकि इससे पहले भी! शीर्ष अदालत ने ईवीएम अर्थात इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के माध्यम से डाले गए मतों के 100% सत्यापन की मांग को ठुकरा दिया था। अदालत ने तभी स्पष्ट कर दिया था कि- मतपत्रों की ओर लौटना, वास्तव में बड़ी बाधा होगा और चुनाव प्रक्रिया में मतपत्रों से जुड़ी जो गड़बड़ियां खत्म की जा चुकी हैं, वे दोबारा सामने आ जाएंगी। आपको बता दें कि- भारतीय लोकतंत्र इस बात का साक्षी रहा है क, हमेशा लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग सूझबूूझ और विवेक के साथ किया है। उदाहरण के लिए- कई राज्यों में बार-बार देखा गया है कि, लोकसभा और विधानसभा के लिए लोग अलग-अलग राजनीतिक दलों को मतदान करते हैं। भले ही दोनों चुनाव! एक साथ ही क्यों न हों। ऐसे में सवाल क्यों उठ रहे हैं। यहीं पर सरकारी संस्थानों की शुचिता की बात आ जाती है। जबकि अक्सर चुनाव आयोग पर सवाल उठे। विपक्ष को मौका मिला आयोग पर सवाल उठाने का, जिससे ईवीएम पर शक बढ़ा। अब इसबार भी महाराष्ट्र में ईवीएम के 90 फीसद चार्ज रहने का मुद्दा, विपक्ष ने उठाया। लेकिन यह मुद्दा राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह गया। दरअसल, चुनाव आयोग हर बार तकनीकी पक्ष को लेकर बयान दे देता है।
आयोग का कहना है कि- ईवीएम को विश्वसनीय बनाने के लिए अनेक उपाय किए गए हैं। आपको बता दें कि- दावों-प्रतिदावों को छोड़ उचित यह होगा कि, विपक्ष ईवीएम में हेरफेर के बारे में अपनी पुरानी बयानबाजी छोड़ दे और उन संभावित राजनीतिक कारणों पर विचार करे, जो उसकी चुनावी हार का कारण बन रहे हैं। हालांकि चुनाव सुधारों पर बात होनी चाहिए, जो सतत प्रक्रिया भी है। लेकिन इसमें सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी होनी चाहिए। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि- दुनिया के कई देशों ने ईवीएम से किनारा कर लिया है। लेकिन भारत अभी बाकी दुनिया की राह पर नहीं चलना चाहता। इसका एकमात्र कारण है कि- समय और संसाधन की बचत जैसे तर्क ईवीएम के पक्ष में दिए जाते हैं। ऐसे में यह विचारणीय मुद्दा खड़ा हो जाता है कि- समय और संसाधन बचाते हुए, हम लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े कुछ सवालों की अनदेखी तो नहीं कर रहे? अब ईवीएम को लेकर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? जवाब जरूर दें।