खबरों के खिलाड़ी । सुप्रीमकोर्ट की यूपी पुलिस पर कड़ी टिप्पणी ने एक बार फिर, देश के पुलिस सिस्टम की जर्जर हालत को उजागर कर दिया है। अदालत का कहना है कि- पुलिस अपने पावर का दुरुपयोग कर रही है और पुलिस को अधिक संवेदनशील होने की भी जरूरत है।अब यह टिप्पणी इस बात का प्रमाण है कि- पुलिसिया व्यवस्था में अत्यंत सुधार की आवश्यकता है। आपको बता दें कि- सुप्रीमकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, यूपी पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। उससे यही जाहिर होता है कि- मर्ज पुराना और गंभीर भी है। क्योंकि अगर देश की शीर्ष अदालत को, यहां तक कहना पड़े कि- पुलिस अपने पावर का आनंद ले रही है और उसे संवेदनशील होने की जरूरत है। तो इसका स्पष्ट मतलब है कि- खाकी उन अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही! जिसके लिए उसे इतनी शक्तियां दी गई हैं। अब अदालत की टिप्पणी फिर से याद दिला रही है कि- देश में पुलिस सिस्टम में सुधार की कितनी जरूरत है।

दरअसल, समाज के एक बड़े तबके में पुलिस के लिए आदर नहीं! बल्कि डर का भाव है। लोगों को थाने में जाकर, अपनी बात कहने से डर लगता है। हालांकि, अक्सर हम बात करते हैं कि- आमजन पुलिस के साथ सहयोग करें। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है! जबतक कि आमजन का पुलिस पर भरोसा ही नहीं होगा। इसकी वजह है पुलिसिया कार्यप्रणाली! जो अभीतक औपनिवेशिक मानसिकता में जकड़ी दिखाई देती है और इसकी वजह से कानून नहीं, डर का शासन ज्यादा दिखता है। अब सवाल यह भी है कि- पुलिस इस मानसिकता से निकलेगी कैसे? जबकि उसकी बुनियाद में अब भी 1861 का वही पुलिस एक्ट है! जो अंग्रेजों ने हिंदुस्तानियों पर राज करने के लिए बनाया था।
हालांकि इसबात को डेढ़ सौ साल से ज्यादा हो गए और इस दौरान देश-समाज ने इतनी तरक्की कर ली है। लेकिन उसकी तुलना में पुलिस सिस्टम वहीं ठहरा हुआ लगता है। जबकि कहने को तो- सिस्टम में सुधार के लिए 1977 में नेशनल पुलिस कमिशन बना, रिबेरो समिति, पदमनाभैया समिति और मलिमथ समिति आई। लेकिन किसी के भी सुझावों पर, पूरी तरह अमल नहीं किया गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, 2006 में पुलिस सुधारों के लिए कुछ दिशा-निर्देश दिए थे। इसमें कहा गया था कि- स्टेट सिक्यॉरिटी कमिशन का गठन हो और डीजीपी समेत दूसरे अफसरों को भी, कम से कम दो साल का मौका मिले। इनका मकसद यह था कि- पुलिस को राजनीतिक दबाव से निकाला जाए, ताकि वह स्वतंत्र रूप से काम कर सके। अब कहने की जरूरत नहीं कि, इन बातों पर अमल नहीं हुआ।
आपको बता दें कि- मार्च 2023 में सरकार ने संसद में जानकारी दी थी कि, देश में प्रति एक लाख आबादी पर औसतन केवल 152.80 पुलिसकर्मी हैं। यूपी में तो यह आंकड़ा! और भी कम था, महज 133.86। हालांकि इसबात से इनकार नहीं किया जा सकता कि- पूरे देश की पुलिस दबाव में है। दबाव का मतलब- सीनियर्स का प्रेशर, काम के घंटे, छुट्टियों की कमी। अर्थात कुल मिलाकर यह स्थिति! उस डिपार्टमेंट के लिए सही नहीं कही जा सकती, जिस पर सुरक्षा जैसी अहम जिम्मेदारी है। अब हमलोग यह तो सोच रहे हैं कि- पुलिस सुधर जाए, लेकिन यह भी सोचना होगा कि- उनके काम का माहौल सुधरे। अगर दोनों चीजें साथ होंगी, तभी परिणाम बेहतर मिलेगा। अब इस पूरे मामले पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? कमेन्ट जरूर करे ।