खबरों के खिलाड़ी । अब से ठीक पांच साल पहले की बात है। वर्ष 2019 में लोकसभा का चुनाव हो चुका था और साल भर बाद, बिहार में विधानसभा का चुनाव होना था। तब सभी सियासी पार्टियां, विधानसभा चुनाव की तैयारियों में लगे हुए थे और पार्टियों का चुनावी मु्द्दों पर मंथन भी चल रहा था। इसी दौरान सत्ताधारी जदयू के भीतर भयंकर घमासान मचा था। क्योंकि जदयू के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह और उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर! आपस में ही गुत्थमगुत्था खेल रहे थे। दरअसल- नागरिकता कानून पर प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह उलझे हुए थे। क्योंकि जहाँ प्रशांत किशोर नागरिकता कानून के खिलाफ थे। वहीं, बहैसियत पार्टी अध्यक्ष आरसीपी सिंह भाजपा की तरफदारी कर रहे थे और नागरिकता कानून के पक्ष में थे। ठीक वैसे ही, एकबार फिर से जदयू में वर्चस्व की जंग शुरू हो गयी है। अर्थात- किसी की नीतीश कुमार की ‘कुर्सी पर, तो किसी की जदयू पार्टी पर है नजर।

ऐसे में सवाल है- अब क्या करेंगे, बिहार के सीएम नीतीश? आपको बता दें कि- फिलहाल बिहार में फॉग नहीं! बल्कि जदयू में वर्चस्व की जंग चल रही है। वैसे तो जेडीयू में कई गुटों की बात कही जा रही है! लेकिन मौजूदा टकराव- राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और राष्ट्रीय महासचिव मनीष वर्मा के बीच दिखाई दे रहा है। दरअसल- यह नीतीश कुमार की राजनीति का आजमाया तरीका है। हालांकि यह भी सच है कि- नीतीश जिसे भी पार्टी में ऊंचे ओहदे पर बिठाते हैं, वह अपने आप को उनका उत्तराधिकारी समझने की भूल कर बैठता है। अतः आरसीपी सिंह और प्रशांत किशोर भी इसी मुगालते के शिकार हुए थे।
बता दें कि- वैसे भी नीतीश कुमार! अपने कद से बड़ा, किसी को भी होने नहीं देते। ऐसा वह समता पार्टी के समय से ही करते रहे हैं। याद कीजिये- पहले जार्ज फर्नांडिस और बाद में शरद पवार का भी, नीतीश ने क्या हाल किया! यह किसी से छिपा नहीं है। इतना ही नहीं! इसके बाद में आरसीपी सिंह, उपेंद्र कुशवाहा और प्रशांत किशोर भी, उसी गति को प्राप्त हुए। वर्तमान में अब जदयू के भीतर, फिर से नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी बनने की जंग छिड़ी हुई है। क्योंकि जब संजय झा को नीतीश ने कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया तो, उनके भीतर भी पार्टी में नंबर दो की हैसियत का भ्रम हो गया।

दरअसल- संजय झा के एक निर्देश ने नीतीश कुमार को असहज कर दिया है। क्योंकि उनका निर्देश! नीतीश कुमार के खास बनकर उभरे, मनीष वर्मा को लेकर जारी हुआ है। क्योंकि नीतीश की सलाह पर, आईएएस की नौकरी छोड़ कर मनीष ने जेडीयू ज्वाइन किया और नीतीश के स्वजातीय होने के कारण! लोग मनीष को नीतीश का उत्तराधिकारी मानने लगे हैं। बता दें कि- मनीष वर्मा को नीतीश कुमार ने जिलों में कार्यकर्ता समागम का दायित्व सौंपा है और वे इसमें कामयाब भी दिख रहे हैं। लेकिन इसी बीच अचानक कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा के निर्देश पर, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने तत्काल प्रभाव से कार्यकर्ता समागम का कार्यक्रम स्थगित करने का पत्र जारी कर दिया। इतना ही नहीं! पत्र भी तब जारी हुआ-जब मनीष वर्मा किसी शादी समारोह में शामिल होने झारखंड गए थे।
अतः अब जानकार इस मामले को, पार्टी में वर्चस्व की जंग भी बता रहे हैं। हालांकि, पिछले अनुभवों के आधार पर कयास लगाए जा रहे हैं कि- इसपर भी नीतीश कुमार, कहीं कोई कड़ा फैसला न ले लें। क्योंकि आरसीपी सिंह और प्रशांत किशोर के विवाद में, नीतीश ने दोनों को सबक सिखाया था। क्या इस बार भी नीतीश उसी तरह का कोई कदम उठाएंगे? यह सवाल सियासी गलियारे में गूंज रहा है। लेकिन एक सवाल यह भी है कि- क्या टूट जाएगी जदयू या नीतीश का खत्म होगा सियासी करियर? अपने जवाब जरूर दीजिएगा।