Chandauli News: 25 साल पुराने मामले में हुई न्यायालय उठने तक की सजा

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Chandauli News: सैयदराजा थाना क्षेत्र के साल 2003 के एक आर्म्स एक्ट मामले में आरोपी मनोज कुमार कसेरा को न्यायालय ने दोषी करार देते हुए न्यायालय उठने तक की सजा सुनाई। यह मुकदमा 6 जनवरी 2003 को दर्ज किया गया था। इसमें मनोज कुमार कसेरा निवासी परेव, थाना बिहटा, जनपद पटना (बिहार) के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा पंजीकृत हुआ था।

गुरुवार को सिविल जज इंदू रानी की अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए न्यायालय उठने तक की सजा सुनाई। साथ ही 1000 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया। अर्थदंड न देने पर 10 दिन की अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी। उधर, साल 2017 में हुए मारपीट के मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट चंदौली की अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी ठहराते हुए न्यायालय उठने तक की सजा सुनाई और 9000 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया।

अर्थदंड न देने पर तीनों को तीन दिन के अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी। यह मामला धानापुर थाना क्षेत्र के डेढ़वलिया गांव का है। 6 नवंबर 2017 को दर्ज मामले में आरोपी लाल बहादुर पटेल, शेषनाथ पटेल और सविता देवी के खिलाफ मारपीट का मुकदमा पंजीकृत किया गया था। न्यायालय ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए न्यायालय उठने तक की सजा सुनाई।

क्या होता है न्यायालय उठने तक की सजा
न्यायालय उठने तक की सजा” एक कानूनी शब्दावली (legal term) है, जो आमतौर पर सामान्य, हल्के अपराधों में दी जाती है। इसका मतलब है- जिस समय तक कोर्ट की कार्यवाही चल रही है, उतने समय तक दोषी को कोर्ट में ही बैठाए रखना और जैसे ही कोर्ट की कार्यवाही खत्म हो, उसे रिहा कर देना।

उदाहरण – मान लीजिए किसी को अदालत ने आज दोषी माना और “न्यायालय उठने तक की सजा” दी, तो उस व्यक्ति को उसी दिन कोर्ट के उठने तक वहीं बैठाए रखा जाएगा और जैसे ही जज उठते हैं (कोर्ट बंद होती है), उसे छोड़ दिया जाएगा।

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