विकास नहीं, सम्मान चाहिए.. कैसे 1995 में लालू बने बिहार के मसीहा और फिर जंगलराज के प्रतीक?

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Jungle Raj in Bihar

Jungle Raj in Bihar: विकास नहीं, सम्मान चाहिए! यह नारा 1995 में बिहार की सियासत में गूंजा और लालू प्रसाद यादव को दिलाई प्रचंड जीत। लेकिन यह जीत ही आगे चलकर उनके पतन की वजह भी बनी। लालू यादव के उत्थान से लेकर पतन तक की कहानी बिहार की राजनीति में एक मिसाल है- कैसे एक मसीहा ‘जंगलराज’ के प्रतीक में बदल गया।

1995 का चुनाव: जातीय गोलबंदी का चरम

1995 विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने पिछड़ों और गरीबों को सामाजिक सम्मान देने का वादा किया। उस समय सवर्णों के वर्चस्व को तोड़ने की लहर तेज थी। लालू ने सभा में कहा था- मैं आपको स्वर्ग नहीं पहुँचा सकता, लेकिन आपको आवाज़ ज़रूर दूँगा।

जनता ने इस वादे पर भरोसा किया और जनता दल को 324 में से 167 सीटों पर जीत मिली। यह 1990 के चुनाव से 45 सीट अधिक थी। लेकिन खास बात यह थी कि इनमें 63 विधायक यादव जाति के थे, और 55 जिला अध्यक्षों में से 21 भी यादव थे।

राजनीति में ‘यादवीकरण’ का आरोप

पूर्ण बहुमत के बाद सत्ता में यादवों का वर्चस्व तेजी से बढ़ा। 1996-97 तक पटना जिले के 49 थानों में से 25 थानों की कमान यादव पुलिस अधिकारियों के पास थी।
इससे विपक्ष ने लालू पर राजनीति में ‘यादवीकरण’ का आरोप लगाया। सत्ता में उनके करीबी और रिश्तेदार भी ताकत का गलत इस्तेमाल करने लगे।

चारा घोटाला: करिश्मा टूटने की शुरुआत

1996 में चारा घोटाले का खुलासा हुआ। लालू पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उनकी छवि को गहरा झटका पहुंचा। नतीजतन 1997 में उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।
इसके बाद भी उन्होंने सत्ता में बने रहने की कोशिश की, लेकिन 2000 के चुनाव में जनता दल (आरजेडी) केवल 124 सीटों पर सिमट गया।

मसीहा से ‘जंगलराज’ तक का सफर

1995 में लालू गरीबों के मसीहा बने, लेकिन जातिवाद, अपराध और भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी लोकप्रियता को खोखला कर दिया। धीरे-धीरे “विकास नहीं, सम्मान चाहिए” का नारा जंगलराज के पर्याय में बदल गया।

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