
Bihar Politics 2025: बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर अपनी पुरानी पहचान — “सियासी संतुलन साधने वाले खिलाड़ी” — को सामने ला दिया है। सोमवार को अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के एक कार्यक्रम में हुआ एक छोटा-सा वाकया अब बड़े राजनीतिक बहस का कारण बन गया है।
दरअसल, कार्यक्रम के दौरान कुछ लोग सीएम का सम्मान करने के लिए उन्हें इस्लामिक टोपी पहनाना चाहते थे। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ज़मा खान भी आगे बढ़े और उन्होंने नीतीश को एक काली टोपी पहनाने की कोशिश की। लेकिन नीतीश कुमार ने टोपी पहनने की बजाय मुस्कुराते हुए टोपी वापस ज़मा खान को ही पहना दी।
यह नजारा कैमरों में कैद हुआ और अब सियासी गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर नीतीश ने यह “टोपी वाला दांव” क्यों चला और इसके चुनावी मायने क्या हैं।
नीतीश की “बैलेंस पॉलिटिक्स” की झलक
नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत हमेशा से रही है – संतुलन साधना। वे कभी किसी एक वर्ग की ओर झुकाव स्पष्ट तौर पर नहीं दिखाते।
अगर वे इस्लामिक टोपी पहन लेते, तो विपक्ष और खासकर भाजपा खेमे के नेता इसे “तुष्टिकरण की राजनीति” कहकर हमला बोलते।
अगर वे काली टोपी पहन लेते, तो अल्पसंख्यक वर्ग में यह संदेश जा सकता था कि वे केवल औपचारिकता निभा रहे हैं।
ऐसे में नीतीश ने दोनों टोपी पहनने से इनकार कर संतुलन साधते हुए उन्हें वापस उसी शख्स को पहना दी, जिसने उन्हें पहनाने की कोशिश की थी।
भाजपा गठबंधन और संदेश
नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू इस समय भाजपा के साथ गठबंधन में है। भाजपा का कोर वोट बैंक हिंदू समाज है। इस पृष्ठभूमि में नीतीश का यह कदम भाजपा को यह संकेत देने जैसा है कि वे गठबंधन की मर्यादा को समझते हैं और किसी भी विवादित तस्वीर का हिस्सा नहीं बनना चाहते। हालांकि, अल्पसंख्यक वोट बैंक पर इसका असर कितना होगा, यह बड़ा सवाल है।
अल्पसंख्यक वोट बैंक पर असर?
नीतीश कुमार लंबे समय से अल्पसंख्यक समाज को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं। उनके कई कार्यक्रम सीधे इसी वर्ग को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।
लेकिन क्या मंच पर टोपी न पहनना इस वोट बैंक में दूरी पैदा करेगा या फिर लोग इसे “न्यूट्रल स्टैंड” मानकर स्वीकार करेंगे? इसका जवाब चुनावी नतीजों में मिलेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार पांडेय का कहना है कि इसे सियासी संदेश से जोड़कर देखने की आवश्यकता नहीं है।
उन्होंने कहा, “नीतीश कुमार कई बार अपने मंत्रियों को माला पहना देते हैं या गुलदस्ता थमा देते हैं। यह उनका हल्का-फुल्का अंदाज है, इसे ओवर-पॉलिटिकल नहीं किया जाना चाहिए।”
संतुलन साधने वाले नेता के रूप में नीतीश
बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार हमेशा से “संतुलन साधने वाले नेता” के रूप में पहचाने जाते रहे हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले चुनाव में यह टोपी वाला संतुलन उन्हें कितना फायदा या नुकसान पहुंचाता है और भाजपा गठबंधन में इसे किस नज़र से देखा जाता है।
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