
Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सीमांचल का इलाका सियासी महाभारत का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ सीमांचल पहुंच चुकी है, जिसने चुनावी माहौल को गरमा दिया है। भीड़ उमड़ रही है, नारे गूंज रहे हैं और राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल वही है – क्या इस बार सीमांचल में ओवैसी फैक्टर तय करेगा बाज़ी?
सीमांचल क्यों है किंगमेकर?
सीमांचल की लगभग 40 से 45 विधानसभा सीटें (Bihar Election 2025) बिहार की सत्ता का गणित तय करती हैं। पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, सहरसा और सुपौल जैसे जिलों में मुस्लिम वोटरों की संख्या 30-35% के बीच है। यादव, दलित और ओबीसी तबके की मजबूत मौजूदगी के कारण यह इलाका हर चुनाव में राजनीतिक दलों के लिए निर्णायक साबित होता है।
2020 के विधानसभा चुनाव (Bihar Election 2025) में बीजेपी-जेडीयू को यहां 12 सीटें, कांग्रेस-आरजेडी-वाम दलों को 7 सीटें और ओवैसी की एआईएमआईएम को 5 सीटें मिली थीं। हालांकि बाद में 4 एआईएमआईएम विधायक आरजेडी में शामिल हो गए, जिससे महागठबंधन ने बढ़त बनाई। यही वजह है कि इस बार सभी की नजर सीमांचल पर टिकी है।
राहुल-तेजस्वी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का असर
राहुल गांधी और तेजस्वी यादव सीमांचल के किसानों, मजदूरों, बेरोजगार युवाओं और खासतौर पर मुस्लिम-पिछड़े वर्गों को साधने की कोशिश में जुटे हैं। वरिष्ठ पत्रकार संजीव पांडेय के मुताबिक –
कांग्रेस यहां गरीब, मजदूर और गैर-यादव पिछड़ों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। तेजस्वी यादव का आरजेडी के पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक पर पहले से ही प्रभाव है। ऐसे में यह यात्रा सीमांचल में महागठबंधन की ताकत को बढ़ा सकती है।
महागठबंधन का गणित
- आरजेडी: मुस्लिम वोट बैंक पर 80-90% तक पकड़।
- कांग्रेस: गरीब और किसान वर्ग को जोड़ने की कोशिश।
- वीआईपी (मुकेश सहनी): मल्लाह और निषाद वोटरों पर असर।
- वामदल: मजदूर और किसान वर्ग में पकड़।
अगर ये सभी वोट एकजुट होते हैं, तो सीमांचल में महागठबंधन को 50-55% वोट तक मिल सकते हैं।
एनडीए और ओवैसी की चुनौती
बीजेपी-जेडीयू का यहां लगभग 35-40% वोट बैंक है, जिसमें ब्राह्मण, राजपूत और अन्य उच्च जाति के साथ कुछ ओबीसी और मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं। लेकिन ओवैसी की एआईएमआईएम 2020 की तरह इस बार भी गेम-चेंजर साबित हो सकती है। ओवैसी सीमांचल में मुस्लिम वोटों को 10-12% तक काट सकते हैं, खासकर किशनगंज और अररिया में। यह वोट कटाव महागठबंधन को नुकसान पहुंचा सकता है और अप्रत्यक्ष रूप से एनडीए को फायदा दिला सकता है।
किसके पाले में जाएगा सीमांचल?
राहुल-तेजस्वी की जोड़ी सीमांचल को महागठबंधन का गढ़ बनाने की कोशिश कर रही है। वहीं बीजेपी-जेडीयू अपनी मोदी-नीतीश फैक्टर और सरकारी योजनाओं के सहारे सियासी जमीन मजबूत करने में लगी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर मुस्लिम वोट ओवैसी की ओर झुके तो महागठबंधन का गणित बिगड़ेगा या फिर सीमांचल में राहुल-तेजस्वी का ‘खेल’ बन जाएगा?