
Sonbarsha Assembly Seat: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है और सोनबरसा (SC आरक्षित) सीट भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बन गई है। यह सीट सीतामढ़ी जिले में आती है और यहां का राजनीतिक इतिहास पिछले दो दशकों से बेहद रोचक रहा है।
पिछले 20 साल का चुनावी ट्रेंड
Sonbarsha Assembly Seat
सोनबरसा सीट पर कभी राजद (RJD) का वर्चस्व रहा, तो कभी जदयू (JDU) ने अपना दबदबा दिखाया। वहीं 2020 में विकासशील इंसान पार्टी (VIP) ने यहां से जीत दर्ज कर सभी को चौंका दिया।
- 2005: इस चुनाव में राजद और जदयू के बीच सीधी टक्कर रही।
- 2010: जदयू को बड़ी जीत मिली और सीट पर नीतीश कुमार फैक्टर चला।
- 2015: महागठबंधन के तहत राजद ने वापसी की और सीट अपने खाते में डाली।
- 2020: इस चुनाव में सीट जदयू ने वीआईपी को दी थी और वीआईपी उम्मीदवार ने जीत दर्ज की।
कुल मिलाकर देखा जाए तो सोनबरसा की जनता हर बार नया समीकरण बनाती रही है और यहां का वोट बैंक किसी एक पार्टी का स्थायी नहीं माना जाता।
जातीय समीकरण का असर
सोनबरसा विधानसभा सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है। यहां दलित (पासी, चमार, दुसाध आदि) वोटरों की संख्या सबसे अधिक है। इसके अलावा यादव, मुस्लिम और ब्राह्मण वोटर भी इस चुनावी गणित को प्रभावित करते हैं।
SC वोटर – 30% से ज्यादा
यादव और मुस्लिम वोटर – करीब 25%
सवर्ण और अन्य पिछड़ा वर्ग – लगभग 20%. इन जातीय समीकरणों को साधना हर दल के लिए बड़ी चुनौती है।
2025 की तैयारियों में कौन आगे?
- राजद (RJD): लालू-तेजस्वी की पार्टी इस सीट को हर हाल में फिर से हासिल करना चाहती है। स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाई गई है।
- जदयू (JDU): नीतीश कुमार का दल भी दलित समीकरण साधने की कोशिश में जुटा है। संगठन ने गांव-गांव तक पहुंच बनाना शुरू कर दिया है।
- भाजपा (BJP): यहां भाजपा का वोट बैंक सीमित है, लेकिन 2025 में अपने उम्मीदवार उतारने या एनडीए के साझेदार के साथ सीट जीतने की रणनीति बना रही है।
- विकासशील इंसान पार्टी (VIP): 2020 की जीत के बाद मुकेश सहनी की पार्टी इस सीट को फिर से जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।
स्थानीय मुद्दे क्या कह रहे हैं?
सोनबरसा में सड़क, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सुविधाएं सबसे बड़े मुद्दे हैं। सीमावर्ती इलाका होने के कारण यहां विकास की रफ्तार धीमी रही है। युवाओं का पलायन एक बड़ी समस्या है। यही वजह है कि जनता अब केवल जातीय समीकरण नहीं, बल्कि उम्मीदवार की छवि और विकास एजेंडे को भी देख रही है।
2025 का समीकरण
अगर जातीय समीकरण की बात करें तो दलित और पिछड़ा वर्ग का वोट बैंक जिस पार्टी के साथ जाएगा, उसकी जीत लगभग तय मानी जाएगी। हालांकि, मुस्लिम-यादव वोट बैंक एक बार फिर राजद के पक्ष में जा सकता है। वहीं नीतीश कुमार फैक्टर और एनडीए की एकजुटता से जदयू-भाजपा भी मजबूत दावेदार बन सकती है।
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