Bihar Election 2025: कभी गढ़ था पटना, अब रणछोड़ क्यों बनी BJP, सीटें छोड़ने के पीछे क्या प्लान है?

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Bihar Election 2025

Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, सियासी माहौल और दिलचस्प होता जा रहा है। इस बार मुकाबला सीधा नहीं, बल्कि त्रिकोणीय होता दिख रहा है। इसी बीच, पटना जिले में बीजेपी की नई रणनीति ने सबको चौंका दिया है। कभी शहरों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी, अब अपने ही गढ़ में पीछे हटती दिख रही है। सवाल यह उठता है — क्या यह रणनीति जीत की राह है या हार को स्वीकारने की तैयारी?

बदलता सियासी समीकरण

पटना जिले की 14 विधानसभा सीटों पर इस बार बीजेपी के दांव में बड़ा फेरबदल हुआ है। पार्टी ने कई सीटें जेडीयू और एलजेपी (राम विलास) को सौंप दी हैं। कभी मजबूत पकड़ वाली सीटों से बीजेपी का पीछे हटना यह संकेत देता है कि पार्टी अब “प्रत्याशी नहीं, फ्यूज बल्ब” बदलने के मूड में है।

रणछोड़ बनी बीजेपी

  • मोकामा विधानसभा सीट

यह सीट अब जेडीयू के खाते में गई है। बाहुबली अनंत सिंह यहां से मैदान में हैं। 2022 के उपचुनाव में बीजेपी की सोनम देवी ने यहां 63 हजार वोट हासिल किए थे, लेकिन हार गईं। अब बीजेपी ने इस सीट से ‘रणछोड़’ की भूमिका निभाई है।

  • फतुहा सीट

2020 में यहां बीजेपी प्रत्याशी सत्येंद्र सिंह लड़े थे, जिन्हें आरजेडी के अनिरुद्ध यादव ने हराया। इस बार बीजेपी ने यह सीट एलजेपी (राम विलास) को दे दी है, जिसने रूपम कुमारी को टिकट दिया है।

  • बख्तियारपुर सीट

2020 में रणविजय सिंह बीजेपी के उम्मीदवार थे, लेकिन 2025 में यह सीट भी एलजेपी के खाते में चली गई। अब यहां से अरुण कुमार मैदान में हैं।

  • मनेर विधानसभा

2020 में बीजेपी के निखिल आनंद यहां से लड़े थे और आरजेडी के भाई वीरेंद्र से हार गए थे। अब बीजेपी ने यह सीट भी छोड़ दी है। एलजेपी ने यहां जितेंद्र यादव को मैदान में उतारा है।

फ्यूज बल्ब बदले गए उम्मीदवार

  • बाढ़ विधानसभा

बीजेपी ने अपने पुराने विजेता ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू की जगह डॉ. सियाराम सिंह को टिकट दिया है।

  • कुम्हरार विधानसभा

वरिष्ठ विधायक अरुण कुमार की जगह अब संजय गुप्ता मैदान में हैं।

  • पटना साहिब

स्पीकर नंदकिशोर यादव का टिकट काटकर युवा नेता रत्नेश कुशवाहा को उतारा गया है।

  • विक्रम विधानसभा

यहां बीजेपी ने दलबदलू कार्ड खेला है। कांग्रेस के सिद्धार्थ, जो पहले विरोधी थे, अब बीजेपी के नए चेहरे हैं।

बीजेपी का यह बड़ा फेरबदल रणनीतिक रिस्क जैसा लगता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी जातीय समीकरण और गठबंधन की मजबूरी में पुराने चेहरों को हटाकर प्रयोगात्मक राजनीति खेल रही है। लेकिन सवाल यह है — क्या नए चेहरे जनता को आकर्षित कर पाएंगे? या फिर बीजेपी की यह नई चाल, उसके पुराने गढ़ को कमजोर कर देगी? दरअसल, पटना बीजेपी का गढ़ माना जाता था। अगर यहीं पार्टी ‘रणछोड़’ बन रही है, तो 2025 का चुनाव उसके लिए चेतावनी भी है और चुनौती भी।

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