
Chhath Puja 2025: नहाय-खाय के साथ इस साल चार दिवसीय छठ महापर्व 2025 की शुरुआत हो चुकी है। यह लोक-आस्था का महापर्व न केवल बिहार और पूर्वांचल में, बल्कि देश और विदेश में भी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि छठी मइया व्रती और उनके परिवार की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। हालांकि बिहार और यूपी में लोग छठी मइया के बारे में अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन कई लोगों को अभी तक यह नहीं पता की छठी मैया कौन हैं और छठ पूजा का सूर्य देवता से क्या संबंध है, तो आइये छठ पूजा का इतिहास और इस महापर्व का सूर्य देवता से क्या संबंध है इसे जानते हैं।
छठी मइया कौन हैं?
छठी मइया का संबंध षष्ठी तिथि से है। उन्हें ब्रह्मा की मानस पुत्री और सूर्य देव की बहन माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, छठी मइया उर्वरता, समृद्धि और संतान की रक्षा की देवी हैं। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में लोग संतान की सुरक्षा और परिवार की समृद्धि के लिए छठ पूजा करते हैं। मान्यता है कि जैसे सूर्य अपनी रोशनी से धरती को जीवन देता है, वैसे ही छठी मइया पूरे परिवार में उजाला फैलाती हैं।
मार्कंडेय पुराण में उल्लेख है कि प्रकृति को छह हिस्सों में बांटा गया और छठा हिस्सा छठी मइया का स्वरूप है। इसीलिए उन्हें ‘छठी’ कहा जाता है।
छठ पूजा का इतिहास और महत्व
छठ पूजा की शुरुआत वैदिक काल से मानी जाती है। ऋग्वेद में सूर्य उपासना का जिक्र मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा प्रियंवद और रानी मालिनी की संतान नहीं थी। उन्होंने ऋषि कश्यप की सलाह पर पुत्रेष्ठि यज्ञ किया, लेकिन उनके पुत्र का जन्म मृत हुआ। दुखी होकर राजा ने जीवन समाप्त करने की सोची, तभी देवी छठी मइया प्रकट हुईं और उन्हें पूजा करने के लिए प्रेरित किया। इस व्रत के बाद उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। तभी से संतान की लंबी उम्र और उनकी भलाई के लिए छठ पूजा की शुरुआत हुई।
कई पौराणिक कथाओं में यह भी बताया गया है कि भगवान राम और माता सीता, कुंती माता और द्रौपदी ने भी छठ पूजा की थी। इन कथाओं के अनुसार छठ व्रत करने से संतान और परिवार की समृद्धि आती है।
सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व
छठी मइया को सूर्यदेव की बहन माना जाता है। छठ पूजा में सूर्य को अर्घ्य देना धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
धार्मिक रूप से, सूर्य जीवन, ऊर्जा और सफलता के प्रतीक हैं। उन्हें अर्घ्य देने से स्वास्थ्य, संतान और समृद्धि की कामना की जाती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से, जल में खड़े होकर उगते और डूबते सूर्य को निहारना सकारात्मक ऊर्जा, तनाव मुक्ति और डिटॉक्सिफिकेशन में मदद करता है। पानी पर सूर्य की परावर्तित किरणें आँखों और त्वचा के लिए लाभकारी मानी जाती हैं।
छठ महापर्व के चार दिन
- नहाय-खाय: व्रत की शुरुआत, शरीर और मन की शुद्धि का प्रतीक।
- खरना: गुड़ और चावल की खीर से उपवास का आरंभ।
- संध्या अर्घ्य: डूबते सूर्य को अर्घ्य, संतान और परिवार की समृद्धि की प्रार्थना।
- उषा अर्घ्य: उगते सूर्य को अर्घ्य, व्रत का समापन। चार दिन का यह महापर्व शुद्धता, संयम और आत्मनियंत्रण का प्रतीक है।
ALSO READ – Chhath Puja 2025: नहाय-खाय से शुरू हुआ लोक आस्था का महापर्व, जानें व्रत की विधि, नियम