
Bihar Election Result 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के रुझानों ने साफ कर दिया है कि इस बार जनता ने एनडीए को ऐतिहासिक जनादेश दिया है, जबकि महागठबंधन बुरी तरह सिमट गया है। तेजस्वी यादव को सीएम चेहरा बनाकर उतरने वाले गठबंधन से जिस मजबूत वापसी की उम्मीद थी, वह पूरी तरह ढह गई। चुनावी माहौल और जनता की प्रतिक्रियाओं को समझने पर साफ होता है कि महागठबंधन कई बड़ी रणनीतिक गलतियों का शिकार हो गया, जिसके चलते उसका पूरा समीकरण बिगड़ गया।
महागठबंधन की 5 बड़ी गलतियां, जिन्होंने चुनावी गणित बिगाड़ दिया
वोट चोरी को गलत समय पर बड़ा मुद्दा बनाना
कांग्रेस ने चुनाव में वोट चोरी के मुद्दे को केंद्र में रखकर बड़ा अभियान छेड़ा। राहुल गांधी ने पहले चरण से ठीक पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में एनडीए पर वोट चोरी का आरोप लगाया। इसके साथ ही दरभंगा की “वोट यात्रा” में मंच से प्रधानमंत्री की मां पर की गई अपमानजनक टिप्पणी ने कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया। भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बनाकर महागठबंधन पर सीधा प्रहार किया।
वोटर लिस्ट संशोधन (SIR) विवाद का असर न होना
महागठबंधन ने SIR को चुनावी धांधली का बड़ा मुद्दा बताने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट में मामला जाने के बाद इस पर उनका विरोध कमजोर पड़ गया। जनता ने इस विवाद को गंभीरता से नहीं लिया। अखिलेश यादव ने भी SIR को “साजिश” बताया, लेकिन यह रणनीति प्रभावी साबित नहीं हुई।
जनता को अवास्तविक और अतिशयोक्तिपूर्ण वादे
तेजस्वी यादव की ओर से हर परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी, जीविका दीदी को 10,000 रुपये और अन्य कई भारी-भरकम वादे किए गए। जनता ने इन्हें अव्यावहारिक माना। इसके मुकाबले नीतीश कुमार की स्थिरता और 20 साल के विकास मॉडल के भरोसे ने एनडीए को बढ़त दिलाई।
लगातार नकारात्मक राजनीति की छवि
महागठबंधन ने चुनाव अभियान को सुरू से अंत तक नकारात्मक हमलों पर केंद्रित रखा—प्रधानमंत्री को “भ्रष्टाचार का भीष्म पितामह” कहने जैसे बयान जनता को पसंद नहीं आए। मतदाताओं को लगा कि महागठबंधन विकास के बजाय सिर्फ विरोध की राजनीति पर खड़ा दिख रहा है, जिसका नुकसान सीधे चुनावी परिणामों में झलकता है।
तेजस्वी को सीएम चेहरा घोषित करने का उल्टा असर
तेजस्वी यादव को सीएम चेहरा बनाना महागठबंधन की सबसे विवादित रणनीतियों में रहा। लालू प्रसाद यादव के “जंगल राज” की याद को एनडीए ने लगातार उछालकर जनता के मन में भय और अस्थिरता का भाव जीवित रखा। तेजस्वी अपनी छवि को इससे पूरी तरह अलग नहीं कर पाए, और जनता ने जोखिम उठाने के बजाय एनडीए को सुरक्षित विकल्प माना।
नतीजा: NDA की रिकॉर्ड बढ़त
रणनीतिक चूकों, गलत समय पर उठाए गए मुद्दों, अवास्तविक वादों और नकारात्मक प्रचार ने महागठबंधन को चुनावी दौड़ से लगभग बाहर कर दिया। वहीं एनडीए का स्थिर नेतृत्व, साफ संदेश और जमीनी रणनीति ने उसे ऐतिहासिक सफलता दिलाई है।
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