हाईकोर्ट ने पूर्व सासंद धनंजय सिंह की अपील खारिज की, कहा- आप पीड़ित ही नहीं..

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पूर्व सासंद धनंजय सिंह

Dhananjay Singh Appeal Dismissed: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी के नदेसर में 23 साल पहले हुए जानलेवा हमले के मामले में पूर्व सांसद धनंजय सिंह को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने उनकी अपील को खारिज करते हुए साफ कहा कि इस मामले में उन्हें कानूनी रूप से अपील करने का अधिकार ही प्राप्त नहीं है।

धनंजय सिंह को ‘पीड़ित’ मानने से अदालत का इंकार
अदालत ने कहा कि 2002 की घटना में धनंजय सिंह को चोट नहीं आई थी, बल्कि उनके गनर और ड्राइवर घायल हुए थे। ऐसे में कानून की नज़र में वही इस मामले के वास्तविक पीड़ित हैं। इसलिए आरोपितों को बरी करने के खिलाफ अपील दायर करने का अधिकार भी उन्हीं को है, धनंजय सिंह को नहीं।

गैंग्स्टर एक्ट: निजी व्यक्ति को अधिकार नहीं

हाईकोर्ट ने दोहराया कि गैंग्स्टर एक्ट एक विशेष कानून है, जिसमें एफआईआर दर्ज करने और कार्रवाई शुरू करने का अधिकार केवल राज्य सरकार को होता है। किसी निजी व्यक्ति को इस अधिनियम में न तो रिपोर्ट दर्ज करने का अधिकार है और न ही कानूनी प्रक्रिया को चुनौती देने का।

राज्य और समाज के खिलाफ माना जाता है अपराध

अदालत के अनुसार गैंग्स्टर एक्ट के तहत दर्ज अपराध किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे राज्य और समाज के खिलाफ माना जाता है। इसलिए निजी व्यक्ति को इस प्रक्रिया में विशेष अधिकार नहीं दिए जा सकते। अदालत ने कहा कि यदि राज्य चाहती, तो वह आरोपितों की बरी के खिलाफ अपील कर सकती थी।

ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में किया था बरी

2002 में नदेसर इलाके में धनंजय सिंह पर हमले के दौरान उनके गनर व ड्राइवर घायल हुए थे। गनर ने विधायक अभय सिंह, एमएलसी विनीत सिंह समेत कई लोगों पर गैंग्स्टर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया था। बाद में ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की कमी के चलते सभी को बरी कर दिया था।

राज्य सरकार ने भी किया अपील का विरोध

सरकारी पक्ष ने अदालत में स्पष्ट किया कि धनंजय इस मामले में ‘पीड़ित’ नहीं हैं, इसलिए उन्हें अपील का हक नहीं मिलता। इसी तर्क को स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि अपील न केवल अनुचित है, बल्कि विधिक दृष्टि से विचारणीय भी नहीं।

अपील खारिज, बरी का आदेश बरकरार

अदालत ने अंत में धनंजय सिंह की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। अब ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपितों की बरी का फैसला यथावत रहेगा, जब तक कि राज्य सरकार स्वयं कोई कदम न उठाए।

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