
Om Birla no-confidence motion: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिए जाने के बाद संसद की कार्यप्रणाली और संवैधानिक व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव, दूसरी ओर डिप्टी स्पीकर का खाली पद, और सत्ता–विपक्ष के बीच बढ़ता टकराव—इन हालात में सबसे अहम प्रश्न यही है कि यदि स्पीकर सदन की कार्यवाही न संभालें, तो लोकसभा की कमान किसके हाथ में जाएगी?
ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव
विपक्षी दलों ने लोकसभा नियम 94(c) के तहत स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंपा है। इस नोटिस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, वाम दल, आरजेडी समेत लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दल इसमें शामिल हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने खुद को इस प्रक्रिया से अलग रखा है। राजनीतिक हलकों में इसे संसदीय इतिहास का एक असाधारण और गंभीर कदम माना जा रहा है।
डिप्टी स्पीकर का खाली पद बना बड़ी चुनौती
मौजूदा लोकसभा में अब तक डिप्टी स्पीकर की नियुक्ति नहीं हो सकी है। आम तौर पर स्पीकर की अनुपस्थिति में डिप्टी स्पीकर सदन की कार्यवाही संभालते हैं, लेकिन जब यह पद ही रिक्त हो, तो स्थिति संवैधानिक रूप से संवेदनशील हो जाती है।
स्पीकर और डिप्टी स्पीकर दोनों न हों तो क्या?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 95(2) के अनुसार, यदि लोकसभा में स्पीकर और डिप्टी स्पीकर दोनों के पद खाली हों, तो राष्ट्रपति किसी एक लोकसभा सदस्य को सदन की अध्यक्षता की जिम्मेदारी सौंप सकते हैं। इस सदस्य को आमतौर पर स्पीकर प्रो टेम कहा जाता है।
कौन होता है स्पीकर प्रो टेम?
स्पीकर प्रो टेम की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। परंपरा के अनुसार यह जिम्मेदारी लोकसभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य को दी जाती है। उनका मुख्य कार्य नए सांसदों को शपथ दिलाना और नई लोकसभा के पहले सत्र की कार्यवाही चलाना होता है, जब तक कि नया स्पीकर निर्वाचित न हो जाए।
क्या चेयरपर्सन्स का पैनल संभाल सकता है जिम्मेदारी?
लोकसभा नियम 9 के तहत स्पीकर द्वारा नामित पैनल ऑफ चेयरपर्सन्स भी सदन की अस्थायी अध्यक्षता कर सकता है। हालांकि यह व्यवस्था केवल अल्पकालिक अनुपस्थिति के लिए होती है, न कि लंबे संवैधानिक विवाद की स्थिति के लिए।
कार्यवाही चलाने के अधिकार
जो भी सदस्य सदन की अध्यक्षता करता है—चाहे वह स्पीकर प्रो टेम हो या पैनल का कोई चेयरपर्सन—उसके पास सदन की कार्यवाही संचालित करने के सभी प्रक्रियात्मक अधिकार होते हैं। वह बहस की अनुमति देता है, व्यवस्था बनाए रखता है और लोकसभा की गरिमा सुनिश्चित करता है।
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