
Lucknow News: राजधानी लखनऊ के स्मृति उपवन में 11 मार्च को आयोजित कार्यक्रम के बाद गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा देने की मांग को लेकर धार्मिक और राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इस कार्यक्रम का नेतृत्व शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने किया, जिनका कहना है कि गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने के लिए आंदोलन जारी रहेगा।
हालांकि कार्यक्रम से पहले प्रशासन द्वारा लगाई गई 26 शर्तों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। इसे लेकर शंकराचार्य ने प्रशासन पर लोकतांत्रिक अधिकारों को बाधित करने का आरोप लगाया।
कार्यक्रम से पहले प्रशासन की 26 शर्तें
शंकराचार्य के अनुसार लखनऊ प्रशासन ने कार्यक्रम की अनुमति देने से पहले 26 कड़ी शर्तें रखीं। इन शर्तों में सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कई नियम शामिल थे।
आरोप है कि कार्यक्रम के लिए पुलिस सुरक्षा का खर्च आयोजकों से ही जमा कराने की बात कही गई, जिससे आयोजन को लेकर विवाद और बढ़ गया।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे “लोकतंत्र का गला घोंटना” बताते हुए कहा कि प्रशासन ने अनुमति देने में भी जानबूझकर देरी की, जिससे बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके।
खाली कुर्सियों के बीच भी जारी रहा आंदोलन
कार्यक्रम स्थल पर लगाए गए पंडाल में कई कुर्सियां खाली दिखाई दीं, लेकिन इसके बावजूद शंकराचार्य ने मंच से गौमाता को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा देने की मांग दोहराई और इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा मुद्दा बताया।
उन्होंने कहा कि यह केवल एक धार्मिक मांग नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़ा विषय है।
2027 विधानसभा चुनाव से जुड़ा नया राजनीतिक मुद्दा
इस कार्यक्रम के बाद यह मुद्दा अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है। कार्यक्रम में कई विपक्षी नेता भी मौजूद रहे।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने मंच साझा करते हुए इस मुद्दे को समर्थन दिया।
सपा ने किया बड़ा वादा
समाजवादी पार्टी की ओर से यह भी कहा गया कि यदि पार्टी सत्ता में आती है तो गाय को ‘राज्य माता’ का दर्जा देने पर विचार किया जाएगा।
इसके बाद राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या यह मुद्दा 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नया राजनीतिक एजेंडा बन सकता है।
आस्था और राजनीति के बीच बढ़ी बहस
पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा देने की मांग केवल धार्मिक आस्था का विषय है या यह राजनीति का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है।
फिलहाल इस मुद्दे पर बहस तेज है और माना जा रहा है कि आने वाले समय में यह विषय राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बना रह सकता है।
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