खबरों के खिलाड़ी। महाराष्ट्र में सरकार गठन में देरी से बिगड़ रहा सत्ता का समीकरण और महायुति गठबंधन में असमंजस की स्थिति से लग रहीं कई अटकलें। क्योंकि पिछली सरकार में भी काफी उथल-पुथल बनी रही थी। तब शिवसेना के साथ मिलकर भाजपा ने चुनाव लड़ा था। मगर चुनाव नतीजों के बाद शिवसेना ने पाला बदल लिया और कांग्रेस तथा NCP से हाथ मिला कर, महाविकास अघाड़ी की सरकार बना ली थी।
आपको बता दें कि- अक्सर गठबंधन में चुनाव जीत कर, बहुमत हासिल करने पर मुख्यमंत्री पद को लेकर असमंजस की स्थिति बन ही जाती है। फिर, गठबंधन धर्म का निर्वाह करने और सहयोगी दलों के साथ, सौहार्दपूर्ण समीकरण बिठाने में कई बार कठिनाई पेश आती है। अब महाराष्ट्र में भाजपा के सामने भी वही स्थिति है। क्योंकि महाराष्ट्र में भाजपा ने एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना और अजित पवार की अगुआई वाली NCP के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था और सबसे ज्यादा सीटें भाजपा को मिलीं। लेकिन स्पष्ट बहुमत से महज 13 सीटें कम आयी। इस लिहाज से देखा जाए तो- मुख्यमंत्री पद पर भाजपा का हक बनता है। हालांकि शुरू में एकनाथ शिंदे ने जरूर कुछ दबाव बनाने का प्रयास किया था, मगर आखिरकार! शिंदे ने भी भाजपा का नेतृत्व स्वीकार कर लिया। इस तरह से अब! भाजपा के लिए रास्ता साफ हो गया और देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे माना जाने लगा। मगर दिल्ली में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ बैठक के बाद भी, मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा नहीं की जा सकी है। इसीलिए चुनाव नतीजों के सात दिन बाद भी, इस मामले में निर्णय नही लिए जा सकने से स्वाभाविक ही! तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

ऐसा इसलिए हो रहा! क्योंकि पिछली सरकार में भी काफी उथल-पुथल बनी रही। अतः संभव है की- महाराष्ट्र में उलट-फेर की आशंका, भाजपा को अब भी सता रही होगी। इसलिए भाजपा अपने नई सरकार के गठन में, किसी भी तरह से सहयोगी दलों को असंतुष्ट नहीं रखना चाहती। इसके अलावा जातियों का समीकरण भी भाजपा को साधना है और वह मराठा दबदबे से अलग, पिछड़े और दलित वर्ग में अपना पैठ बनाना चाहती है।
दरअसल! मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के बाद, जिस तरह से भाजपा ने पिछड़े-दलित वर्गों को संतुष्ट करने का प्रयास किया। उससे यह कयास स्वाभाविक रूप से लगाया जाने लगा है कि- महाराष्ट्र में भी भाजपा! कोई हैरान करने वाला फैसला कर सकती है। क्योंकि राजनीति में केवल सरकार बना लेना महत्त्वपूर्ण नहीं होता। बल्कि सरकार के माध्यम से अपने जनाधार का विस्तार करना भी महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में भाजपा इसी रणनीति पर काम कर रही है। मगर सरकार के गठन में देरी से प्रशासनिक कामकाज पर प्रतिकूल असर पड़ता है। क्योंकि मतदाता उन वादों को अमली जामा पहनते देखना चाहते हैं, जो चुनाव प्रचार के दौरान विजेता पक्ष ने किए थे। साथ ही! प्रशासनिक अमला भी इंतजार करता रहता है कि- नई सरकार निर्देश दे कि, उसे किन मसलों को तरजीह देना है और किन मसलों को छोड़ना है।
आपको बता दें कि- महाराष्ट्र आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों में शुमार है! इसलिए वहां सरकार गठन में होने वाली देरी का असर, अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। हालांकि यह भी ठीक है कि- गठबंधन में संतुलन साधना कठिन होता है, मगर महाराष्ट्र में ऐसी कोई अड़चन नजर नहीं आती। अतः भाजपा को ही, अपने असमंजस से बाहर निकलना है। चूंकि वह सबसे बड़ी पार्टी है और उसे सहयोगी दलों के साथ, उदारता पूर्वक व्यवहार करना और उनके सहयोग का सम्मान करना होगा। तभी जाकर महायुति की टिकाऊ और भरोसेमंद सरकार बन पाएगी। जबकि पहले ही महाराष्ट्र! काफी उठा-पटक झेल चुका है। और अब! उसे राजनीतिक स्थायित्व की जरूरत है।