Bihar Politics: जातिवाद से मुक्ति का वादा करने वाले PK अब इस ब्राह्मण बहुल सीट से लड़ेंगे चुनाव!

Spread the love & Share it

Bihar Politics

Bihar Politics: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK) ने बड़ा ऐलान कर दिया है। गुरुवार को उन्होंने बताया कि वह सासाराम जिले की करगहर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। लेकिन जैसे ही यह घोषणा हुई, राजनीतिक गलियारों में सवालों का सैलाब उमड़ पड़ा। वजह साफ है – करगहर एक ब्राह्मण बहुल सीट है और मौजूदा विधायक भी इसी जाति से आते हैं।

जातिवाद के खिलाफ लड़ाई, पर ब्राह्मण बहुल सीट क्यों?

पिछले दो सालों से पीके अपनी जन सुराज यात्रा के जरिए बिहार के हजारों किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं। हर सभा में वह पलायन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और जातिगत राजनीति को बिहार की सबसे बड़ी समस्या बताते रहे। पीके ने बार-बार कहा कि “जब तक बिहार को जाति की राजनीति से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक विकास संभव नहीं है।”

लेकिन करगहर जैसी जातीय रूप से संवेदनशील सीट से चुनाव लड़ने का उनका फैसला उनकी ही बातों के उलट माना जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या पीके भी वही कर रहे हैं, जिसकी आलोचना वे लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार में करते रहे हैं।

लालू परिवार से तुलना

लोग पीके की तुलना लालू प्रसाद यादव के बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप यादव से कर रहे हैं, जो हमेशा यादव बहुल सीटों से चुनाव लड़ते रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या पीके भी जातीय आधार पर सीट चुनकर वही राजनीति कर रहे हैं, जिससे वे बिहार को निकालने का दावा करते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय

राजनीतिक विश्लेषक संजीव पांडेय मानते हैं कि पीके का यह कदम उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह उनकी छवि के लिए झटका है। उन्होंने कहा एक ओर पीके खुद को जाति-विहीन राजनीति का चेहरा बताते हैं, दूसरी ओर उनका यह कदम एक ही जाति को साधने की कोशिश जैसा दिख रहा है। अगर वे बदलाव की राजनीति की बात करते हैं, तो उन्हें ऐसे कदमों से बचना चाहिए।

जन सुराज का तर्क

पीके और जन सुराज पार्टी का तर्क है कि करगहर सिर्फ ब्राह्मणों का गढ़ नहीं है। यहां कुर्मी, कोइरी और अनुसूचित जाति के मतदाता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, यह सीट पीके की जन्मभूमि है और वे पहले भी कह चुके हैं कि राजनीति करनी है तो या तो “जन्मभूमि से या कर्मभूमि से।”
पीके समर्थकों का कहना है कि यह कदम न सिर्फ ब्राह्मण वोट बल्कि अन्य समुदायों में भी सेंध लगाने की रणनीति है।

क्या उल्टा पड़ सकता है दांव?

कुल मिलाकर, पीके की राजनीति अब तक हमेशा लीक से हटकर रही है। लेकिन करगहर जैसी ब्राह्मण बहुल सीट से चुनाव लड़ना उनके सिद्धांतों के खिलाफ दिख रहा है। यही कारण है कि अब यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि- क्या पीके भी उसी जातीय राजनीति की दलदल में फंस गए हैं, जिससे बाहर निकालने का वादा वह पिछले दो सालों से करते आ रहे हैं?

ALSO READ – Bihar Election 2025: बिहार बंद पर लालू का पलटवार – कहा, गुजराती लोग बिहारियों को हल्के में ना लें


Spread the love & Share it

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *