
Youth Protest in Nepal: नेपाल की राजधानी काठमांडू सोमवार को ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ चल रहे आंदोलन ने अचानक उग्र रूप ले लिया। हजारों युवा सड़कों पर उतर आए और संसद भवन में घुसने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक भिड़ंत हुई। हालात बेकाबू होते देख पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें 20 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई। स्थिति को संभालने के लिए सेना को भी मोर्चे पर उतारना पड़ा है।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
नेपाल सरकार ने 2023 में सोशल मीडिया ऐप्स के लिए गाइडलाइंस बनाई थी और विदेशी कंपनियों से देश में रजिस्ट्रेशन की शर्त रखी थी। सरकार का कहना था कि बिना रजिस्ट्रेशन के ये कंपनियां देश के कानून से बाहर रहकर काम कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को इन ऐप्स पर सख्ती बरतने का आदेश दिया था।
इसी क्रम में नेपाल कैबिनेट ने 28 अगस्त 2025 को सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को एक सप्ताह में रजिस्ट्रेशन कराने का निर्देश दिया। लेकिन किसी ने भी अनुपालन नहीं किया। इसके बाद 5 सितंबर को सरकार ने फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर), टिकटॉक समेत 26 ऐप्स को बैन कर दिया।
युवाओं ने इस कदम को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना और इसके खिलाफ ‘हम नेपाल’ नामक संगठन के बैनर तले आंदोलन शुरू कर दिया।
आंदोलन क्यों हुआ उग्र?
हालांकि तत्काल कारण सोशल मीडिया बैन है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि युवाओं का असंतोष कहीं ज्यादा गहरा है। माओवादी आंदोलन और राजतंत्र की समाप्ति के बाद युवाओं ने नए नेपाल की उम्मीदें पाल रखी थीं, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई ने हालात और बिगाड़ दिए।
युवाओं का कहना है कि बड़े राजनीतिक दल – माओवादी, नेपाली कांग्रेस और एमाले – जनता की समस्याओं को हल करने के बजाय केवल सत्ता संघर्ष में लगे हैं। कोविड-19 के बाद बिगड़ी आर्थिक स्थिति से भी कोई सुधार नहीं हुआ। इसके चलते युवाओं का भरोसा राजनीतिक व्यवस्था से उठ गया है।
श्रीलंका-बांग्लादेश से मिली प्रेरणा
नेपाल के युवा आंदोलन की प्रेरणा हाल के वर्षों में श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए जनआंदोलनों से भी मिली है। 2022 में श्रीलंका और 2024 में बांग्लादेश में युवाओं ने सड़कों पर उतरकर सत्ता परिवर्तन कराया। अब नेपाली युवाओं को लगता है कि अगर पड़ोसी देशों में यह संभव है, तो नेपाल में भी बदलाव लाया जा सकता है।
नेपाल में युवा आंदोलन के पीछे छिपे 5 बड़े कारण
- भाई-भतीजावाद की राजनीति
नेपाल सरकार पर लंबे समय से नेपोटिज्म (भाई-भतीजावाद) के आरोप लगते रहे हैं। नेताओं और उनके परिवारों की आलीशान जीवनशैली और शान-ओ-शौकत सोशल मीडिया पर उजागर हुई। इसी बीच ‘नेपो बेबी’ अभियान ने युवाओं में गुस्से की लहर और तेज कर दी।
- भ्रष्टाचार का काला चिट्ठा
पिछले 4 साल में नेपाल सरकार पर कई बड़े घोटालों के आरोप लगे। खासकर तीन बड़े भ्रष्टाचार मामलों ने युवाओं का भरोसा तोड़ दिया। इन घोटालों ने सरकार की छवि को बुरी तरह से ध्वस्त किया और युवाओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
- बेरोजगारी और आर्थिक असमानता
नेपाल में बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है। फिलहाल 10.71% युवा बेरोजगार हैं, वहीं महंगाई दर 5.2% तक पहुंच चुकी है। स्थिति यह है कि सिर्फ 20% आबादी के पास 56% संपत्ति है, जिनमें ज्यादातर राजनेता और उनके परिवार शामिल हैं। इस असमानता ने युवाओं को और बेचैन कर दिया।
- चीन से नजदीकी
जुलाई 2024 में केपी ओली की सरकार आने के बाद नेपाल का झुकाव चीन की तरफ बढ़ गया। भारत के साथ सीमा विवाद को हवा देने से नेपाल पर आर्थिक दबाव बढ़ा और नागरिकों में नाराजगी भी तेज हो गई। युवाओं को लगा कि सरकार की विदेश नीति उनके भविष्य के लिए घातक है।
- राजशाही की मांग
लगातार भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता के बीच युवाओं का एक वर्ग अब राजशाही की वापसी की मांग करने लगा है। पिछले 5 साल में नेपाल में तीन बार सरकारें बदली हैं। मौजूदा हिंसा और नेताओं के इस्तीफों के बाद एक बार फिर सत्ता परिवर्तन की चर्चा तेज हो गई है।
आगे क्या?
काठमांडू से शुरू हुआ यह आंदोलन अब नेपाल के अन्य शहरों में भी फैल रहा है। सरकार ने सेना की तैनाती कर हालात नियंत्रित करने का दावा किया है, लेकिन सोशल मीडिया पर बैन हटेगा या नहीं – यह सवाल फिलहाल जस का तस है। साफ है कि नेपाल का जेनरेशन Z अब राजनीतिक दलों के पुराने ढर्रे से समझौता करने को तैयार नहीं है और बड़े बदलाव के मूड में है।
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