आखिर क्यों कम नहीं हो रही बिहार में पप्पू यादव और लालू परिवार के बीच अदावत। हालांकि, पप्पू यादव सदैव से अपनी भावनाएं लालू यादव के प्रति छिपाते नहीं हैं। फिर भी दोनों के बीच अच्छे संबंध तो ना के बराबर ही कहे जाएंगे। आखिर क्यों हैं ये दूरियां? एक तरफ लालू यादव से पप्पू यादव दूर भी नहीं जा सकते और साथ भी नहीं रह सकते, आखिर क्या है पप्पू यादव की मजबूरी? आखिर क्यों लालू यादव स्वीकार नहीं करते पप्पू यादव को? आईये इन सवालों के जवाब जानते हैं विस्तार से…
इस लोकसभा चुनाव से भी आप अच्छे से समझ जाएंगे ये मजबूरी और दूरी। बता दें कि, राकेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को बिहार ही नहीं, अब देश में भी ज्यादातर लोग जानने लगे हैं। कभी बाहुबली की पहचान रखने वाले पप्पू यादव ने लालू यादव से राजनीति का ककहरा सीखा, लेकिन लंबे समय तक दोनों का साथ बरकरार नहीं रह पाया। क्योंकि पप्पू यादव अपनी शर्तों पर राजनीति करते रहे। लेकिन फिर भी पप्पू कभी लालू यादव के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाए। बता दें कि, खुद को लालू यादव का तीसरा बेटा तक कहने वाले पप्पू यादव की, उनसे अदावत भी कम नहीं रही है। फिर भी पप्पू यादव क्यों खुद को उनसे दूर नहीं कर पाते?
आपके इन सवालों का जवाब देने से पहले बता दें कि, पप्पू यादव की जन्मस्थली मधेपुरा है। वही मधेपुरा जो लालू यादव और शरद यादव की चुनावी लड़ाई का केंद्रबिंदु बनी थी। वहीं, पप्पू यादव चौथी बार पूर्णिया से सांसद बने हैं और दो बार मधेपुरा से भी सांसद रह चुके हैं। मगर इस बार की जीत से पहले पप्पू फूट-फूट कर रोए। जिसे पिता कहते थे, उस पर सवाल दागे। दरअसल, पप्पू यादव ने अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अपनी जन अधिकार पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया। इससे पहले उन्हें आश्वासन मिला था कि पूर्णिया से गठबंधन के वही प्रत्याशी बनेंगे। ऐसे में लालू यादव को साधने के लिए वह उनसे मिलने भी गए, लेकिन लालू यादव ने खेल कर दिया। लालू प्रसाद यादव ने पूर्णिया सीट अपने पास रख ली और पार्टी ने वहां से रूपौली की जदयू विधायक बीमा भारती को अपना टिकट दे दिया। जिसके बाद कांग्रेस ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए और पप्पू यादव फिर अकेले पड़ गए। हालांकि, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और निर्दलीय के तौर पर नामांकन कर दिया। लेकिन इस अवसर पर वह फूट-फूट कर रोए और बोले कि उनके साथ राजनीति हुई है।
पप्पू यादव ने आगे कहा, ‘‘मुझे कांग्रेस का समर्थन प्राप्त है, मैं एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहा हूं… कई लोगों ने मेरी राजनीतिक हत्या करने की साजिश रची। लेकिन पूर्णिया की जनता ने हमेशा पप्पू यादव को जाति-धर्म से ऊपर रखा है और मैं इंडिया गठबंधन को मजबूत करूंगा। क्योंकि मेरा संकल्प राहुल गांधी को मजबूत बनाना है। इसके बाद फिर से शुरू हुआ लालू और पप्पू के बीच अदावत। जब राष्ट्रीय जनता दल के नेता और लालू यादव के सुपुत्र तेजस्वी यादव ने लोकसभा चुनाव 2024 प्रचार के दौरान पूर्णिया में राजद की प्रत्याशी बीमा भारती के समर्थन में चुनावी सभा को संबोधित करने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने कहा कि यह चुनाव दो विचारधारा के बीच की लड़ाई है। तेजस्वी ने कटिहार जिले के कोढ़ा विधानसभा क्षेत्र में कहा, “आप इंडिया गठबंधन को चुनिए. अगर आप इंडिया गठबंधन की बीमा भारती को नहीं चुनते हैं, तो साफ बात है कि आप एनडीए को चुनो। क्योंकि यह एक व्यक्ति का चुनाव नहीं है। तेजस्वी के इस बयान के बाद, पप्पू यादव ने राजद सुप्रीमो लालू यादव पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी वजह से ही उन्हें कांग्रेस का चुनाव चिन्ह नहीं मिला है। उन्होंने आगे कहा कि मुझे तो ये भी नहीं पता कि, आखिर तेजस्वी यादव मुझसे इतनी नफरत क्यों करते हैं? मुझे चुनाव में हराने के लिए वह पूर्णिया हेलीकॉप्टर से आए और प्रचार किया। मैं लालू यादव का केवल ब्लेसिंग लेना चाहता हूं। मुझे लगातार 14 दिनों से राजनीतिक तौर पर टॉर्चर किया जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि मुझे फ्रेंडली फाइट भी नहीं लड़ने दिया जा रहा। पप्पू यादव ने आगे कहा कि अगर आप पहले के लोकसभा चुनाव को देखेंगे तो हम कांग्रेस के खिलाफ नहीं लड़ना चाहते थे, इसलिए हम मधेपुरा चले गए। बीते 20 साल से राजद का रिकॉर्ड देखेंगे तो इस क्षेत्र से वह कभी चुनाव नहीं जीते हैं। ऐसे में एकाएक मेरे खिलाफ यहां से अपना उम्मीदवार उतार देना, कहीं से भी जायज नहीं था। मैं हमेशा लालू यादव के साथ रहा हूं, मैं उनके बड़े बेटे की तरह हूं, मैं उनके बुरे वक्त में हमेशा साथ खड़ा रहा हूं. लेकिन लालू यादव और तेजस्वी ने मुझे धोका हीं दिया है।
हालांकि इतना सब होने के बाद भी पप्पू यादव चुनाव जीत गए। तो अब तक आपको समझ आ चुका होगा कि, बार-बार लालू यादव और तेजस्वी यादव से समर्थन नहीं मिलने के बाद भी पप्पू यादव, क्यों उनके खिलाफ नहीं जा पाते। यह पप्पू यादव की मजबूरी है कि उनके कोर वोटर भी मुस्लिम और यादव ही हैं। ऐसे में अपनी सीट पर लड़ने तक के लिए तो वे लालू यादव से भिड़ सकते हैं। लेकिन मुद्दों पर लालू यादव के साथ रहना उनकी मजबूरी है. यही कारण है कि उन्होंने अपने खिलाफ हाल ही में लोकसभा चुनाव लड़ने वाली और अब विधानसभा उपचुनाव लड़ रही बीमा भारती से मुलाकात कर अपने वोटरों को संदेश दिया कि वो भाजपा को हराने के लिए खून के घूंट भी पी सकते हैं।
एक सवाल यह भी है कि, लालू और तेजस्वी को पप्पू यादव से क्या है दिक्कत? बता दें कि, लालू यादव अब उम्र की उस सीमा पर है कि खुद राजनीति नहीं कर पा रहे। उन्होंने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी छोटे बेटे तेजस्वी को बना दिया है। नीतीश कुमार भी उम्र के उसी पड़ाव पर हैं। ऐसे में लालू यादव को लगता है कि अगर उन्होंने किसी नये उभरते नेता को मौका लेने दिया और उसने काम कर दिखा दिया तो बिहार में फिर उस उभरते नेता का राज आ जाएगा। वैसे भी बिहार में मुख्यमंत्री पद पर लंबे समय तक लालू और नीतीश का ही राज रहा है। ऐसे में बिहार की जनता भी अभी इन दोनों के विकल्प को लेकर कशमकश में है। इसी कारण लालू यादव, कभी पप्पू यादव को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए पूरा जोर लगा देते हैं तो कभी कन्हैया कुमार को। यह लालू यादव ही थे, जिनके कारण इस चुनाव में कांग्रेस ने कन्हैया कुमार को दिल्ली से चुनाव लड़ाया। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि, तेजस्वी से कोई आगे न निकल जाए। इसलिए लालू यादव कभी बिहार में पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसे नेताओं को चुनाव लड़ने और जितने से रोकते रहते हैं।