नहीं संभल रही कानून-व्यवस्था तो इस्तीफा दे दें अधिकारी- मस्जिद में 20 नमाजियों की सीमा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार

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Sambhal Mosque Case

Sambhal Mosque Case: संभल जिले की एक मस्जिद में नमाजियों की संख्या सीमित करने के प्रशासनिक आदेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और यदि अधिकारी इसे संभालने में असमर्थ हैं तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या स्थानांतरण मांग लेना चाहिए।

यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की गई जिसमें आरोप लगाया गया था कि रमजान के दौरान संभल की एक मस्जिद में नमाज पढ़ने वाले लोगों की संख्या प्रशासन ने 20 तक सीमित कर दी है।

रमजान में नमाज पढ़ने पर रोक का आरोप

मामले में याचिकाकर्ता मुनाजिर खान ने अदालत में कहा कि उन्हें संभल में गाटा नंबर-291 पर स्थित मस्जिद में नमाज अदा करने से रोका जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन ने मस्जिद परिसर में केवल 20 लोगों को ही नमाज पढ़ने की अनुमति दी है, जबकि रमजान के दौरान यहां बड़ी संख्या में नमाजी इकट्ठा होते हैं। याचिका में कहा गया कि इस तरह की पाबंदी धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित करती है।

सरकार की दलील को कोर्ट ने किया खारिज

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए नमाजियों की संख्या सीमित करने का आदेश दिया गया था।

हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। 27 फरवरी को दिए गए आदेश में न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और इसे आधार बनाकर धार्मिक गतिविधियों को सीमित नहीं किया जा सकता।

‘कानून-व्यवस्था संभाल नहीं सकते तो इस्तीफा दें’

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि यदि पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन को लगता है कि नमाजियों की संख्या सीमित किए बिना कानून-व्यवस्था बनाए रखना संभव नहीं है, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या स्थानांतरण मांग लेना चाहिए।

पीठ ने कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि हर समुदाय को अपने धार्मिक स्थल पर शांतिपूर्वक पूजा-अर्चना करने का अधिकार मिले।

निजी संपत्ति पर पूजा के लिए अनुमति जरूरी नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पूजा का स्थान किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति पर स्थित है तो वहां पूजा या नमाज के लिए प्रशासन से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती।

अदालत ने कहा कि प्रशासनिक अनुमति केवल उन धार्मिक आयोजनों के लिए आवश्यक होती है जो सार्वजनिक स्थानों या सार्वजनिक भूमि पर आयोजित किए जाते हैं।

जमीन के स्वामित्व को लेकर भी उठा सवाल

सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने दावा किया कि जिस परिसर में मस्जिद होने की बात कही जा रही है, वह राजस्व अभिलेखों में सुखी सिंह के पुत्र मोहन सिंह और भूराज सिंह के नाम दर्ज है।

हालांकि याचिकाकर्ता की ओर से अभी तक मस्जिद से संबंधित तस्वीरें और दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। उन्होंने इन दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लाने के लिए अदालत से समय मांगा है।

16 मार्च को होगी अगली सुनवाई

अदालत ने मामले में आगे की सुनवाई के लिए 16 मार्च की तारीख तय की है। अगली सुनवाई में जमीन से जुड़े दस्तावेज और अन्य साक्ष्य पेश किए जाने की संभावना है।

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