
Chandauli News: चंदौली में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और किसानों को स्थानीय स्तर पर जैविक इनपुट उपलब्ध कराने की दिशा में अहम पहल की गई है। नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग (NMNF) के तहत वित्तीय वर्ष 2026-27 में चंदौली में एक नए बायो इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRC) की स्थापना की जाएगी। इसके लिए उप कृषि निदेशक कार्यालय ने FPO, उद्यमियों और पात्र संस्थाओं से 8 जुलाई 2026 तक आवेदन आमंत्रित किए हैं।
इस केंद्र का उद्देश्य प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक उपलब्ध कराना है, ताकि खेती की लागत कम हो और रसायनों पर निर्भरता घटे।
BRC में तैयार होंगे प्राकृतिक जैविक मिश्रण
प्रस्तावित बायो इनपुट रिसोर्स सेंटर में पशु और पौधों पर आधारित प्राकृतिक जैविक उत्पाद तैयार किए जाएंगे। इनमें जीवामृत, घनजीवामृत, बीजामृत और दशपर्णी अर्क जैसे प्रमुख बायो इनपुट शामिल होंगे। इन उत्पादों की मदद से प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को अपने क्षेत्र में ही आवश्यक सामग्री आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।
आवेदन के लिए क्या हैं जरूरी शर्तें?
उप कृषि निदेशक कार्यालय के अनुसार आवेदन करने वाले FPO, उद्यमी या संस्था के सदस्यों को प्राकृतिक खेती का व्यावहारिक अनुभव होना अनिवार्य है।
इसके अलावा चयनित संस्था या उद्यमी को अपने स्तर पर आवश्यक आधारभूत सुविधाएं विकसित करनी होंगी। इनमें जैविक मिश्रणों के सुरक्षित भंडारण के लिए स्टोरेज कैन, रैक, रेफ्रिजरेटर, गोमूत्र संग्रहण की व्यवस्था, किण्वन (फर्मेंटेशन) चैंबर और बड़े भंडारण की सुविधा शामिल है।
किसानों को प्रशिक्षण भी देना होगा
BRC संचालक की जिम्मेदारी केवल जैविक उत्पाद तैयार करने तक सीमित नहीं होगी। उसे प्राकृतिक खेती से जुड़े क्लस्टर के किसानों और इच्छुक कृषकों को इन जैविक मिश्रणों के उपयोग, तैयार करने की विधि और उनके लाभ के बारे में भी प्रशिक्षण एवं तकनीकी सहयोग देना होगा।
8 जुलाई तक करें आवेदन
उप कृषि निदेशक ने जिले के सभी FPO, उद्यमियों और पात्र संस्थाओं से अपील की है कि वे निर्धारित मानकों के अनुरूप अपना आवेदन 8 जुलाई 2026 तक किसी भी कार्य दिवस में उप कृषि निदेशक, चंदौली कार्यालय में जमा करें, ताकि चयन प्रक्रिया समय पर पूरी की जा सके।
कृषि विभाग का मानना है कि इस पहल से जिले में प्राकृतिक खेती को नई गति मिलेगी और किसानों को स्थानीय स्तर पर जैविक संसाधनों की उपलब्धता आसान होगी। इससे खेती की लागत घटाने के साथ-साथ टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल कृषि को भी बढ़ावा मिलेगा।