खरीफ फसल से पहले किसानों के लिए जरूरी सलाह, एक जुताई बढ़ाएगी पैदावार और घटाएगी लागत

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Summer Ploughing Benefits

Summer Ploughing Benefits: खरीफ सीजन की तैयारी में जुटे किसानों के लिए कृषि विभाग ने महत्वपूर्ण सलाह जारी की है। प्रभारी जिला कृषि रक्षा अधिकारी विनोद कुमार यादव ने किसानों से पारंपरिक कृषि पद्धति के तहत ग्रीष्मकालीन जुताई अपनाने का आग्रह किया है। उन्होंने बताया कि रबी फसलों की कटाई के बाद मई और जून माह में की जाने वाली गहरी जुताई न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारती है, बल्कि आगामी खरीफ फसलों की पैदावार बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मिट्टी की संरचना में होता है सुधार

जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने बताया कि ग्रीष्मकालीन जुताई से खेत की मिट्टी भुरभुरी होती है और उसकी संरचना बेहतर बनती है। इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है, जो खरीफ फसलों के लिए बेहद लाभकारी साबित होती है। मानसून के दौरान खेत में पानी का बेहतर संरक्षण होने से फसलों की वृद्धि भी अच्छी होती है।

उन्होंने कहा कि यह जुताई खेत की कठोर परत को तोड़ने में भी मदद करती है, जिससे पौधों की जड़ों को गहराई तक फैलने का अवसर मिलता है और फसल मजबूत बनती है।

खरपतवार और फसल अवशेष बनते हैं खाद

ग्रीष्मकालीन जुताई के दौरान खेत में मौजूद खरपतवार और फसल अवशेष मिट्टी के भीतर दब जाते हैं। समय के साथ ये सड़कर जैविक खाद का रूप ले लेते हैं, जिससे मिट्टी में जीवांश की मात्रा बढ़ती है और उसकी उर्वरता में सुधार होता है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से मिट्टी को समृद्ध बनाने में मदद करती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम करती है।

कीट, अंडे और लार्वा तेज धूप में हो जाते हैं नष्ट

अधिकारी ने बताया कि गहरी जुताई का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मिट्टी के अंदर छिपे हानिकारक कीट, उनके अंडे, लार्वा, प्यूपा और खरपतवारों के बीज जमीन की सतह पर आ जाते हैं। तेज धूप और उच्च तापमान के संपर्क में आने से ये नष्ट हो जाते हैं।

इससे आगामी फसल में कीटों का प्रकोप कम होता है और किसानों को कीटनाशकों पर कम खर्च करना पड़ता है।

फसल रोगों की संभावना भी होती है कम

ग्रीष्मकालीन जुताई मिट्टी में मौजूद हानिकारक जीवाणुओं, कवक, निमेटोड और अन्य रोगजनक सूक्ष्म जीवों को भी समाप्त करने में सहायक होती है। ये सूक्ष्म जीव अक्सर फसलों में विभिन्न प्रकार की बीमारियों का कारण बनते हैं।

विनोद कुमार यादव ने बताया कि जुताई के बाद मिट्टी में वायु संचार बढ़ता है, जिससे लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि होती है। ये जीव मिट्टी को स्वस्थ बनाए रखने और पौधों की वृद्धि में सहायता करते हैं।

रसायनों के अवशेषों के अपघटन में मिलती है मदद

कृषि विभाग के अनुसार, मिट्टी में पर्याप्त वायु संचार होने से खरपतवारनाशी और कीटनाशी रसायनों के विषाक्त अवशेषों के अपघटन की प्रक्रिया तेज होती है। इसके साथ ही पिछली फसल की जड़ों द्वारा छोड़े गए हानिकारक तत्व भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं।

इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और अगली फसल को स्वस्थ वातावरण मिलता है।

किसानों से पारंपरिक तकनीक अपनाने की अपील

प्रभारी जिला कृषि रक्षा अधिकारी विनोद कुमार यादव ने किसानों से अपील की कि वे ग्रीष्मकालीन जुताई जैसी पारंपरिक और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाएं। उन्होंने कहा कि यह कम लागत में अधिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त करने का प्रभावी तरीका है।

उन्होंने बताया कि इस पद्धति से न केवल फसल उत्पादन में वृद्धि होगी, बल्कि जल, वायु, मृदा और पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में भी मदद मिलेगी। कृषि विभाग का मानना है कि खरीफ सीजन से पहले की गई यह तैयारी किसानों की आय बढ़ाने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


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