10 दिन में तीसरी बार बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, लेकिन सरकार क्यों कह रही- दुनिया से बेहतर हालात?

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Petrol-Diesel Price Hike

Petrol-Diesel Price Hike: वैश्विक तेल संकट, ईरान तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार तीसरी बार बढ़ोतरी हुई है। हालांकि केंद्र सरकार का दावा है कि दुनिया के कई देशों की तुलना में भारत ने आम लोगों को बड़ी राहत दी है और 76 दिनों तक कीमतें स्थिर रखकर उपभोक्ताओं को महंगाई के बड़े झटके से बचाया गया।

शनिवार को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फिर इजाफा हुआ। इसके साथ ही पिछले 10 दिनों में ईंधन करीब ₹5 प्रति लीटर तक महंगा हो चुका है। सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल और सप्लाई संकट के बावजूद भारत में बढ़ोतरी सीमित रखी गई।


तीन चरणों में बढ़े दाम, अब तक करीब ₹5 महंगा हुआ ईंधन

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 15 मई, 19 मई और 23 मई को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तीन बार संशोधन किया गया। इन बढ़ोतरी के बाद कुल मिलाकर पेट्रोल और डीजल के दाम ₹4.74 से ₹4.82 प्रति लीटर तक बढ़ चुके हैं।

शनिवार को पेट्रोल की कीमत में 87 पैसे प्रति लीटर और डीजल में 91 पैसे प्रति लीटर तक का इजाफा किया गया। उद्योग सूत्रों के मुताबिक यह बढ़ोतरी तेल कंपनियों पर बढ़ते आर्थिक दबाव के कारण जरूरी हो गई थी।


सरकार का दावा- दुनिया के मुकाबले भारत में कम बढ़े दाम

केंद्र सरकार का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत ने ईंधन कीमतों को काफी हद तक नियंत्रित रखा। सरकारी सूत्रों के अनुसार, जहां भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगभग 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, वहीं पाकिस्तान में ईंधन 54.9 प्रतिशत तक महंगा हो गया।

इसी अवधि में अमेरिका में कीमतें 44.5 प्रतिशत और ब्रिटेन में 19.2 प्रतिशत तक बढ़ीं। सरकार का दावा है कि भारत उन चुनिंदा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिसने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए कीमतों को लंबे समय तक नियंत्रित रखा।


तेल कंपनियों को रोजाना ₹1000 करोड़ तक का नुकसान

सरकारी सूत्रों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के कारण सरकारी तेल कंपनियों पर भारी दबाव बना हुआ था। बताया गया कि हाल के दिनों में ऑयल मार्केटिंग कंपनियां प्रतिदिन करीब ₹1000 करोड़ तक का नुकसान झेल रही थीं।

हालिया मूल्य वृद्धि के बाद यह घाटा घटकर लगभग ₹750 करोड़ प्रतिदिन तक पहुंचा है। सरकार का कहना है कि अगर कीमतों में संशोधन नहीं किया जाता, तो तेल कंपनियों पर आर्थिक दबाव और बढ़ जाता।


ईरान संकट और होर्मुज स्ट्रेट बना बड़ी वजह

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव माना जा रहा है। अमेरिका-इजराइल की ओर से ईरान पर हमलों और होर्मुज स्ट्रेट में सप्लाई बाधित होने से वैश्विक तेल बाजार में चिंता बढ़ गई है।

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल ट्रांजिट रूट्स में गिना जाता है। यहां से तेल, गैस और पेट्रोलियम उत्पादों की बड़ी मात्रा गुजरती है। ईरान की ओर से इस मार्ग को प्रभावी रूप से बंद किए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई संकट की आशंका गहरा गई।


रुपये की कमजोरी और महंगा आयात भी बना कारण

भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने और रुपये के कमजोर होने का सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है।

सरकार का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आने से तेल आयात की लागत और बढ़ गई, जिससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाना जरूरी हो गया।


BJP बनाम विपक्ष: पेट्रोल-डीजल पर टैक्स को लेकर नई सियासत

सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर विपक्ष शासित राज्यों पर भी निशाना साधा है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि केंद्र की एक्साइज ड्यूटी पूरे देश में समान है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में VAT की दरें अलग होने के कारण कीमतों में अंतर दिखाई देता है।

सरकार के मुताबिक तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में VAT ज्यादा होने के कारण पेट्रोल-डीजल महंगे हैं, जबकि गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, गोवा और असम जैसे राज्यों में कीमतें अपेक्षाकृत कम हैं।

केंद्र ने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया कि वे केंद्र से टैक्स कम करने की मांग तो करते हैं, लेकिन अपने राज्यों में VAT घटाने को तैयार नहीं हैं।


मार्च 2026 में केंद्र ने घटाई थी एक्साइज ड्यूटी

सरकारी सूत्रों ने यह भी बताया कि मार्च 2026 में केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में ₹10 प्रति लीटर तक की कटौती की थी। दावा किया गया कि डीजल पर एक्साइज लगभग शून्य स्तर तक लाया गया। सरकार के अनुसार इस फैसले से केंद्र पर लगभग ₹30,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ा था।


UPA सरकार के ऑयल बॉन्ड पर भी साधा निशाना

केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर पूर्व यूपीए सरकार की नीतियों का भी जिक्र किया। सरकारी दस्तावेजों के हवाले से दावा किया गया कि 2005 से 2010 के बीच यूपीए सरकार ने तेल कंपनियों को राहत देने के लिए लगभग ₹1.34 लाख करोड़ के ऑयल बॉन्ड जारी किए थे। मौजूदा सरकार का कहना है कि वह अब तक इन बॉन्ड्स के मूलधन का ₹1.30 लाख करोड़ से ज्यादा चुका चुकी है।


सरकार बोली- आम जनता को महंगाई से बचाने की कोशिश जारी

सरकारी सूत्रों का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और अब पश्चिम एशिया संकट के दौरान भी भारत ने ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश की ताकि आम लोगों पर महंगाई का ज्यादा असर न पड़े।

हालांकि लगातार बढ़ती कीमतों के कारण अब परिवहन, लॉजिस्टिक्स और जरूरी सामानों की लागत बढ़ने की आशंका भी तेज हो गई है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर अंतरराष्ट्रीय हालात जल्द नहीं सुधरे, तो आने वाले दिनों में ईंधन की कीमतों में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं।


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