
Varanasi News: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित नागरिक अलंकरण समारोह में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के दो प्रमुख प्रोफेसरों को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया। सम्मानित प्रोफेसरों में चिकित्सा विज्ञान संस्थान (IMS) के मेडिसिन विभाग के मानद प्रोफेसर डॉ. श्याम सुंदर और कृषि वैज्ञानिक डॉ. आशोक कुमार सिंह शामिल हैं।
कालाजार के मरीजों के लिए मसीहा बने प्रो. श्याम सुंदर
डॉ. श्याम सुंदर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कालाजार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्म श्री प्रदान किया गया है। उन्होंने लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी की सिंगल डोज थेरेपी विकसित की, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी मान्यता दी है।

उन्होंने RK-39 स्ट्रिप जांच का सबसे पहले परीक्षण किया और परमोमाइसीन तथा मिल्टेफोसिन जैसी दवाओं को भारत, नेपाल और बांग्लादेश में प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1980 से पूर्वांचल और बिहार में कालाजार से जूझ रहे मरीजों के लिए कार्यरत डॉ. श्याम सुंदर ने 40 वर्षों की मेहनत के बाद इस उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी को जड़ से खत्म करने में अहम योगदान दिया।
उन्होंने 10 मिनट में कालाजार की जांच की सस्ती तकनीक विकसित की, जिसकी लागत 300-400 रुपये से घटकर मात्र 50 रुपये रह गई। वर्ष 2002 में उनकी टैबलेट और 2010 में सिंगल डोज इंजेक्शन को भारत सरकार ने स्वीकृति दी। उनकी इस विधि को 2014 में नेपाल और बांग्लादेश में भी अपनाया गया।
डॉ. श्याम सुंदर मूल रूप से बिहार के मुजफ्फरपुर के निवासी हैं। उन्हें पहले ‘विजिटर पुरस्कार’, ‘डॉ. पीएन राजू ओरेशन’, रैनचेक्सी रिसर्च फाउंडेशन अवार्ड (2002) और स्विट्जरलैंड का एंत्री मारेर केशिनी फाउंडेशन अवार्ड (2010) सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। वे 2022 में एसोसिएशन ऑफ फिजिसियन्स ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
धान की नई किस्मों के जनक डॉ. आशोक कुमार सिंह
दूसरे सम्मानित प्रोफेसर डॉ. आशोक कुमार सिंह को परिवर्तनकारी कृषि वैज्ञानिक के रूप में पद्म श्री दिया गया। उन्होंने 25 से अधिक धान की किस्मों का विकास किया, जिनमें 11 बासमती किस्में शामिल हैं। उनके नेतृत्व में भारत का पहला जीनोम संपादित चावल भी विकसित किया गया।
डॉ. आशोक कुमार सिंह मूल रूप से गाजीपुर के रहने वाले हैं और लंबे समय से वाराणसी में रह रहे हैं। BHU के इन दोनों विद्वानों को पद्म श्री मिलने पर विश्वविद्यालय परिवार और पूर्वांचलवासियों में खुशी की लहर है। यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान का सम्मान है, बल्कि चिकित्सा और कृषि क्षेत्र में भारत के शोध कार्य की वैश्विक पहचान भी है।