क्या ममता बनर्जी बचा पाएंगी किला या बदलेगा बंगाल का इतिहास? जानिए 70 साल की राजनीति का पूरा सफर

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West Bengal Election

West Bengal Election: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों का इंतजार आज खत्म होने जा रहा है। सोमवार को आने वाले परिणाम यह तय करेंगे कि राज्य में सत्ता का ताज किसके सिर सजेगा। हालांकि, इस बड़े फैसले से पहले बंगाल की राजनीतिक यात्रा को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि यहां सत्ता का समीकरण कई बार ऐतिहासिक बदलावों से गुजरा है।

कांग्रेस का शुरुआती दबदबा

आजादी के बाद पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का लंबे समय तक वर्चस्व रहा। वर्ष 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव से लेकर 1977 तक कांग्रेस ने यहां सरकार बनाई। हालांकि इस दौरान राजनीतिक अस्थिरता और छोटी अवधि वाली सरकारों का दौर भी देखने को मिला।

1977 में आया बड़ा बदलाव, लेफ्ट का लंबा राज

साल 1977 पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में आया और फिर इतिहास रच दिया। ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट ने लगातार 34 वर्षों तक शासन किया, जो देश के किसी भी राज्य में सबसे लंबा लोकतांत्रिक शासन माना जाता है।

2011 में ममता बनर्जी का उदय

2011 में बंगाल की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिला। ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने लेफ्ट के मजबूत किले को ध्वस्त कर सत्ता पर कब्जा किया। इसके बाद से ममता बनर्जी लगातार राज्य की सत्ता पर काबिज हैं और उन्होंने अपना मजबूत जनाधार बनाए रखा है।

BJP की बढ़ती चुनौती

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी पश्चिम बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत की है। पार्टी ने खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया है, जिससे राज्य की राजनीति में मुकाबला और ज्यादा दिलचस्प हो गया है।

आज का दिन क्यों अहम?

अब जब चुनाव परिणाम घोषित होने जा रहे हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या ममता बनर्जी अपनी सत्ता बरकरार रखेंगी या बंगाल में एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू होगा?

पश्चिम बंगाल की जनता आज अपने फैसले से यह तय करेगी कि राज्य की सियासत किस दिशा में आगे बढ़ेगी। सभी की नजरें अब रिजल्ट पर टिकी हैं, जो न सिर्फ सरकार बल्कि भविष्य की राजनीति की तस्वीर भी साफ करेंगे।


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