
Rupee vs Dollar: भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शुक्रवार का दिन बेहद चिंताजनक साबित हुआ। विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपया (INR) इतिहास में पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96 के स्तर को पार कर गया। रुपये में आई इस रिकॉर्ड गिरावट ने बाजारों से लेकर आम लोगों तक चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी युद्ध जैसे हालात, वैश्विक स्तर पर बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने रुपये पर जबरदस्त दबाव बना दिया है। इसका सीधा असर अब आम आदमी की जेब पर दिखाई देने की आशंका जताई जा रही है।

रुपये की गिरावट क्यों बनी चिंता का कारण?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। जब रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है, क्योंकि सामान खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।
रुपये में आई इस भारी गिरावट के बाद खाद्य तेल, दालें, इलेक्ट्रॉनिक सामान और दूसरी आयातित वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ गई है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि आने वाले दिनों में घरेलू बाजार में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
पेट्रोल-डीजल पर पड़ेगा सबसे बड़ा असर
रुपये की कमजोरी का सबसे ज्यादा असर ईंधन क्षेत्र पर पड़ने वाला है। भारत अपनी कुल तेल जरूरत का करीब 80 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से कच्चे तेल का आयात और महंगा हो जाएगा।
अगर वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो पेट्रोल और डीजल के दामों में भी इजाफा देखने को मिल सकता है। इसका असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ट्रांसपोर्ट महंगा होने से सब्जियां, फल और रोजमर्रा का सामान भी महंगा हो सकता है।
आम आदमी की जेब पर बढ़ेगा बोझ
आर्थिक जानकारों का कहना है कि रुपये की गिरावट का सीधा असर आम परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ेगा। रसोई में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल और दालों की कीमतों में तेजी आने की संभावना है।
इसके अलावा विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों, विदेशी यात्रा करने वालों और डॉलर में भुगतान करने वाली कंपनियों पर भी आर्थिक दबाव बढ़ेगा।
RBI के सामने बढ़ी चुनौती
रुपये को संभालना अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। मुद्रा बाजार को स्थिर रखने के लिए RBI को विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचने पड़ सकते हैं।
इसके साथ ही महंगाई पर नियंत्रण रखने के लिए रिजर्व बैंक रेपो रेट में बढ़ोतरी जैसे कदम भी उठा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की EMI बढ़ सकती है, जिससे आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा।
वैश्विक तनाव बना बड़ी वजह
विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा संकट की आशंकाओं ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इसी वजह से सुरक्षित निवेश की तलाश में डॉलर मजबूत हुआ है, जबकि उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है।
भारतीय बाजार भी इसी वैश्विक अस्थिरता से प्रभावित हो रहा है और फिलहाल रुपये की चाल पर दुनियाभर के आर्थिक हालात का सीधा असर देखा जा रहा है।