
Chandauli News: भारतीय शिक्षा पद्धति को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण से जोड़ने की दिशा में चंदौली में आयोजित संगोष्ठी में शिक्षाविदों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ने पर बल दिया। भारतीय शिक्षण मंडल, काशी प्रांत एवं राहुल नॉलेज सिटी एजुकेशनल कैंपस, महुअर कलां के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति’ विषयक एकदिवसीय संगोष्ठी सह परिचय वर्ग में शिक्षा के भारतीय मॉडल पर विस्तृत चर्चा हुई।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता भारतीय शिक्षण मंडल, काशी प्रांत के उपाध्यक्ष, पूर्व कुलपति एवं बीएचयू के वाणिज्य संकाय के पूर्व अध्यक्ष एवं डीन प्रो. हरेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था विश्व की सबसे मजबूत, समृद्ध और सर्वसमावेशी व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का लक्ष्य स्पष्ट रखना चाहिए और सकारात्मक सोच के साथ योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विकसित भारत का सपना केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के सामूहिक प्रयास, कर्तव्यनिष्ठा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से साकार होगा। उन्होंने पंचवर्षीय योजनाओं से लेकर नीति आयोग तक की विकास यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण का सबसे मजबूत आधार है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय सह-प्रचार प्रमुख एवं बीएचयू के पर्यटन प्रबंध विभाग के आचार्य डॉ. अनिल कुमार सिंह ने भारतीय शिक्षा की गौरवशाली परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समय आ गया है कि भारत अपनी मूल शिक्षा प्रणाली और गुरुकुल परंपरा से प्रेरणा लेकर नई पीढ़ी को संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान करे। उन्होंने भारतीय शिक्षण मंडल के उद्देश्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को विस्तार से रखा।
विशिष्ट वक्ता भारतीय शिक्षण मंडल, काशी प्रांत की महिला गतिविधि प्रमुख एवं शासकीय महिला महाविद्यालय, डीएलडब्ल्यू, वाराणसी के संस्कृत विभाग की अध्यक्ष प्रो. रचना शर्मा ने स्वभाषा आधारित शिक्षा को भारतीय संस्कृति के संरक्षण का सबसे प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी केंद्रित शिक्षा व्यवस्था ने नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर किया है। उन्होंने ऋग्वेद के अश्विन सूक्त का उल्लेख करते हुए प्राचीन भारतीय चिकित्सा ज्ञान की समृद्ध परंपरा पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि परिवार, संस्कृति, नैतिकता और चरित्र निर्माण की आधारशिला है। दादी-नानी की कहानियों, पारिवारिक संस्कारों और सांस्कृतिक परंपराओं के माध्यम से बच्चों के व्यक्तित्व का समग्र विकास होता है। “पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं” जैसी भारतीय जीवन-दृष्टि हमारी शिक्षा का मूल आधार रही है।
कार्यक्रम के दौरान भारतीय शिक्षण मंडल की वाराणसी एवं चंदौली जिला इकाइयों की नई कार्यकारिणी की भी घोषणा की गई। वाराणसी के संयोजक संजीव राय ‘बिल्लू’, सह-संयोजक श्रीमती छवि अग्रवाल एवं डॉ. शैलेंद्र कुमार सिंह बनाए गए। वहीं चंदौली के संयोजक आनंद कुमार तिवारी (सोनू) तथा सह-संयोजक डॉ. निशा सिंह, नवीन कुमार एवं श्रीमती सारिका त्रिपाठी को मनोनीत किया गया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अशोक कुमार ज्योति ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सचिन कुमार सिंह ने प्रस्तुत किया। ध्येय श्लोक, ध्येय वाक्य एवं कल्याण मंत्र का वाचन कश्यप कुमार एवं डॉ. निशा सिंह ने किया। संगोष्ठी में 20 से अधिक शिक्षकों, शिक्षाविदों एवं समाज के विभिन्न वर्गों के गणमान्य लोगों ने भाग लिया।