
Bihar Election 2025: चरण की वोटिंग के बीच सीमांचल का सियासी मैदान इस बार सिर्फ बिहार की नहीं, बल्कि मुस्लिम राजनीति की राष्ट्रीय दिशा तय करने वाला बन गया है। यहां असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के लिए यह चुनाव ‘करो या मरो’ की स्थिति में बदल चुका है।
2020 में बदला था समीकरण, अब और बड़ी चुनौती
सीमांचल क्षेत्र में लगभग 47% मुस्लिम आबादी है और 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने यहां की 24 सीटों में से 5 सीटों पर जीत दर्ज कर सियासत का संतुलन हिला दिया था। इस बार ओवैसी की पार्टी ने कुल 27 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें से 15 सीटें सीमांचल क्षेत्र की हैं। लेकिन मुकाबला अब पहले से कहीं अधिक कठिन है, क्योंकि कांग्रेस, आरजेडी, समाजवादी पार्टी और स्थानीय गठबंधन — सभी ने ओवैसी के प्रभाव को सीमित करने के लिए पूरा मोर्चा खोल दिया है।
मुस्लिम राजनीति की नई दिशा तय करेगा सीमांचल
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, सीमांचल अब सिर्फ बिहार का इलाका नहीं रह गया, बल्कि यह ओवैसी के मुस्लिम नेतृत्व वाले मॉडल का परीक्षण स्थल बन गया है। अगर AIMIM यहां सफलता दोहरा लेती है, तो यह न सिर्फ ओवैसी की राष्ट्रीय भूमिका को मजबूत करेगा, बल्कि मुस्लिम राजनीति को नई वैचारिक दिशा भी देगा।
लेकिन अगर प्रदर्शन कमजोर रहा, तो यह इस मॉडल की सीमाएं उजागर करेगा और देशभर में मुस्लिम नेतृत्व की संभावनाओं पर सवाल खड़ा कर देगा।
विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ने बनाई रणनीति
ओवैसी की बढ़ती पकड़ को देखते हुए मोदी-नीतीश गठबंधन ने भी सीमांचल को अपनी प्राथमिकता सूची में रखा है। सूत्रों के मुताबिक, सत्ता पक्ष की रणनीति मुस्लिम वोट बैंक को विभाजित करने पर केंद्रित है। इसके तहत स्थानीय मुस्लिम चेहरों को AIMIM के खिलाफ मैदान में उतारा गया है ताकि वोटों में सेंध लगाई जा सके।
AIMIM की साख दांव परAIMIM की साख दांव पर
ओवैसी के लिए सीमांचल का यह चुनाव सिर्फ विधानसभा सीटों का सवाल नहीं है — यह उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता और नेतृत्व की साख का भी इम्तिहान है। यदि AIMIM यहां मजबूत प्रदर्शन करती है, तो ओवैसी उत्तर प्रदेश, बंगाल, झारखंड और दिल्ली जैसे राज्यों में मुस्लिम वोट बैंक पर अपनी पकड़ बढ़ाने का दावा और मजबूत करेंगे। लेकिन अगर यह प्रयास नाकाम रहा, तो यह माना जाएगा कि AIMIM की राजनीति बिहार की सीमाओं तक सिमटकर रह गई है।
AIMIM की साख दांव परदूसरे चरण की वोटिंग के साथ ही सीमांचल के इलाकों – किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया में माहौल बेहद गर्म है। हर पार्टी अपनी पूरी ताकत झोंक रही है, लेकिन इस बार असली सवाल यह है कि क्या ओवैसी सीमांचल में अपना किला बचा पाएंगे या मुस्लिम राजनीति में कोई नया चेहरा उभरेगा?
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